नई दिल्ली – भारत के चुनावी इतिहास के सबसे बड़े प्रशासनिक अभ्यासों में से एक, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत नौ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की मतदाता सूची से 1.70 करोड़ (17 मिलियन) से अधिक नाम हटा दिए गए हैं। यह कदम चुनावी प्रक्रिया की शुद्धता और डेटा अखंडता सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।
आंकड़ों का खेल: 21.45 करोड़ से 19.75 करोड़ तक का सफर
मुख्य निर्वाचन अधिकारियों द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, गुजरात, पुदुचेरी, लक्षद्वीप, राजस्थान, छत्तीसगढ़, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, गोवा और केरल में पिछले साल 27 अक्टूबर को प्रक्रिया शुरू होने से पहले कुल मतदाताओं की संख्या 21.45 करोड़ थी। इस सप्ताह अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन के बाद यह संख्या घटकर 19.75 करोड़ रह गई है, जो सीधे तौर पर 1.70 करोड़ मतदाताओं की कमी को दर्शाती है।
जहां यह प्रक्रिया बिहार में पूरी हो चुकी है, वहीं वर्तमान में यह 12 अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जारी है, जिसमें लगभग 60 करोड़ मतदाता शामिल हैं। शेष 40 करोड़ मतदाताओं को 17 राज्यों और पांच केंद्र शासित प्रदेशों के अगले चरणों में कवर किया जाएगा।
हटाने के मुख्य कारण और तकनीक
चुनाव आयोग (ECI) का तर्क है कि मतदाता सूची जीवंत, पात्र और वर्तमान (Living, Eligible, and Current) होनी चाहिए। इस बड़े पैमाने पर फिल्ट्रेशन के लिए तीन मुख्य तकनीकों का उपयोग किया गया:
- आधार लिंकेज और डेटा विश्लेषण: सॉफ्टवेयर के माध्यम से ‘घोस्ट वोटर्स’ (फर्जी मतदाता) और डुप्लिकेट नामों की पहचान की गई।
- डिजिटल एकीकरण: मृत्यु पंजीकरण डेटा का सीधे चुनावी डेटा से मिलान कर मृत व्यक्तियों के नाम हटाए गए।
- केंद्रीकृत जांच: पुरानी मैन्युअल सूचियों के बजाय एक केंद्रीकृत ‘गेटकीपर मैकेनिज्म’ लागू किया गया।
प्रशासनिक तर्क बनाम लोकतांत्रिक सहानुभूति
इस सफाई ने एक नई बहस को जन्म दिया है—प्रशासनिक तर्कसंगतता बनाम लोकतांत्रिक सहानुभूति। विशेषज्ञों का सवाल है कि क्या उन 1.70 करोड़ लोगों को यह साबित करने का पर्याप्त अवसर मिला कि वे जीवित और पात्र हैं?
- प्रवासी मजदूरों की चुनौती: पटना से बेंगलुरु या लखनऊ से मुंबई जाने वाले प्रवासियों के लिए ‘निवास प्रमाण’ देना अक्सर कठिन होता है।
- सबूत का बोझ : सवाल यह है कि क्या नागरिक को बार-बार यह साबित करना चाहिए कि वह जीवित है, या यह संस्था की जिम्मेदारी है कि वह हर पात्र व्यक्ति को शामिल रखे?
कानूनी चुनौतियां और विरोध
इस प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए राजनीतिक दलों ने तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में इस अभ्यास को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। वहीं, असम में 10 फरवरी को SIR के बजाय एक “विशेष पुनरीक्षण” पूरा किया गया।
चुनाव आयोग के अनुसार, निष्पक्ष चुनाव के लिए एक ‘सही सूची’ का होना पहली शर्त है। हालांकि, 1.70 करोड़ नामों का कटना केवल एक प्रशासनिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह उन नागरिकों के राजनीतिक अस्तित्व का सवाल भी है जो शायद इस डिजिटल दौड़ में पीछे छूट गए हों।
