ITI Building Converted to De-Addiction Centre in Haridwar Raises Questions on Education Policy
- भगवानपुर का महिला आईटीआई नशा मुक्ति केन्द्र में तब्दील
- सिस्टम की नीतियों पर उठे गम्भीर सवाल
Deharadun@RashtriyVichar। हरिद्वार के भगवानपुर क्षेत्र में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने को खोले गये आईटीआई भवन में सरकार नशा मुक्ति केन्द्र खोलने जा रही है, इसकी तकरीबन सभी औपचारिकताएं पूरी की जा चुकी हैं, बताया जा रहा कि देहरादून की एक संस्था को इसकी जिम्मेदारी दी गई है। इस भवन के उपयोग बदलने को लेकर सिस्टम की नीतियों को लेकर सवाल खड़े होने लाजमी हैं, जिस राज्य का सपना बेहतर शिक्षा, रोजगार और आत्मनिर्भर युवाओं के आधार पर देखा गया था, वहां आज तकनीकी शिक्षा के लिए बना एक आईटीआई भवन नशा मुक्ति केंद्र में तब्दील किया जा रहा है और यह बदलाव जितना व्यावहारिक दिखता है, उतना ही चुभने वाला भी है।
भगवानपुर क्षेत्र में 2016 में एमएसडीपी योजना के तहत करीब 4.38 करोड़ रुपये की लागत से बना महिला आईटीआई भवन, जिसे युवतियों को तकनीकी रूप से सशक्त बनाने के लिए तैयार किया गया था, वह अपने उद्देश्य तक कभी पहुंच ही नहीं पाया। तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इसका लोकार्पण किया, लेकिन छात्राओं के अभाव में यहां पढ़ाई शुरू नहीं हो सकी। सवाल यह है कि क्या योजना बनाते समय जमीनी जरूरतों का आकलन किया गया था, या सिर्फ कागजों पर विकास का ढांचा खड़ा किया गया?
वर्षों तक वीरान पड़ा यह भवन अब नशा मुक्ति केंद्र के रूप में उपयोग में लाया जाएगा। प्रशासन इसे संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में कदम बता रहा है, और यह तर्क अपने आप में गलत भी नहीं है। लेकिन असली मुद्दा यह है कि आखिर वह स्थिति क्यों बनी, जहां शिक्षा के लिए बना ढांचा बेकार साबित हुआ और नशा मुक्ति केंद्र की जरूरत उससे ज्यादा बड़ी हो गई?
यह बदलाव एक कड़वी सच्चाई को सामने लाता है, प्रदेश में न सिर्फ तकनीकी शिक्षा का विस्तार अपेक्षित स्तर तक नहीं हो पाया, बल्कि युवाओं के सामने नशे जैसी गंभीर सामाजिक समस्या भी तेजी से खड़ी हो गई है। जिस भवन में कौशल, रोजगार और आत्मनिर्भरता की नींव रखी जानी थी, वहां अब नशे की गिरफ्त से युवाओं को बाहर निकालने की कोशिश होगी। यह सिर्फ विडंबना नहीं, बल्कि नीति निर्माण की असफलता का आईना है।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि यह भवन कांग्रेस विधायक ममता राकेश के प्रस्ताव पर बना था। योजनाएं बनीं, बजट आया, उद्घाटन हुआ, लेकिन नतीजा शून्य। ऐसे में सवाल सिर्फ एक भवन का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही का है। क्या योजनाएं सिर्फ राजनीतिक घोषणा बनकर रह गई हैं? क्या शिक्षा और कौशल विकास की योजनाएं जमीनी हकीकत से कट चुकी हैं?
मुख्य विकास अधिकारी ललित नारायण मिश्र का यह कहना कि असफल योजनाओं को दूसरी उपयोगी परियोजनाओं में बदल देना चाहिए, प्रशासनिक दृष्टि से सही हो सकता है, लेकिन यह सोच कहीं न कहीं उस असफलता को स्वीकार करने जैसा भी है, जिसकी समीक्षा और जिम्मेदारी तय होना ज्यादा जरूरी है।
उत्तराखंड के 25 साल पूरे होने पर यह घटना एक प्रतीक बनकर उभरती है,एक ऐसा प्रतीक, जो बताता है कि विकास के दावे और जमीनी हकीकत के बीच अब भी बड़ी खाई है। सवाल यह नहीं है कि नशा मुक्ति केंद्र क्यों बन रहा है, बल्कि यह है कि आईटीआई क्यों नहीं चल पाया?
जब शिक्षा के भवन खाली और नशा मुक्ति केंद्रों की जरूरत बढ़ने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि समस्या सिर्फ संसाधनों की नहीं, प्राथमिकताओं और नीतियों की भी है।
