Toxic water allegedly linked to chemical waste has triggered a serious health crisis in Ahmedabad’s Dholka, with villagers reporting 54 cancer deaths in seven years and TDS levels reaching 3000.
- अहमदाबाद के धोलका में जहरीले पानी का संकट
- ग्रामीणों का आरोप, दूषित पानी पीने से हो रहा कैंसर
Rashtriya Vichar@ अहमदाबाद। गुजरात देश के सबसे औद्योगिक और विकसित राज्यों में गिना जाता है। औद्योगिक विकास, रोजगार और निवेश किसी भी राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। लेकिन विकास की कीमत पर मानव जीवन को दांव पर लगाना कतई न्यायोचित नही हो सकता। गुजरात के अहमदाबाद जिले के धोलका तालुका के भटावाड़ा और आसपास के गांवों में दूषित पानी पेयजल यहां रह रहे लोगों की जान ले रहा है। बीते 7 वर्षों में 54 लोग कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी से मौत की नींद सो गये। ग्रामीणों के अनुसार रासायनिक फैक्ट्रियों से निकलने वाले कथित जहरीले कचरे और दूषित पानी ने इलाके की जमीन, भूजल और लोगों की सेहत को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। भटावाड़ा के साथ त्रासद, नेसड़ा, पालडी और आम्बली समेत आसपास के करीब पांच गांव इस संकट से प्रभावित बताए जा रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि क्षेत्र में संचालित केमिकल फैक्ट्रियों से निकलने वाला रासायनिक कचरा खुले नालों में बहा दिया जाता है। यह दूषित पानी धीरे-धीरे जमीन में रिसता गया और भूजल तथा गांवों के बोरवेल तक पहुंच गया। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ग्रामीणों के मुताबिक क्षेत्र के पानी का टीडीएस स्तर करीब 3000 तक पहुंच चुका है, जिसे वे पीने के लिए अनुपयुक्त बताते हैं।
पानी में जहर का आरोप, बीमारी से जान गंवा रहे लोग
ग्रामीणों की शिकायत केवल कैंसर तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि दूषित पानी के इस्तेमाल से बड़ी संख्या में लोग त्वचा संबंधी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं। बाल झड़ने जैसी शिकायतें भी सामने आ रही हैं। सबसे चिंताजनक स्थिति खेती को लेकर बताई जा रही है। ग्रामीणों के मुताबिक रासायनिक पानी के कारण खेतों की उत्पादकता प्रभावित हुई है और कई जगह जमीन बंजर होती जा रही है।
किसान के लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं होती, बल्कि उसके परिवार की आजीविका और आने वाली पीढ़ियों की उम्मीद होती है। जब पानी दूषित होता है तो उसका असर केवल आज की फसल पर नहीं पड़ता, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता, भूजल और पूरे ग्रामीण जीवन पर पड़ सकता है। यही वजह है कि भटावाड़ा और आसपास के गांवों का संघर्ष केवल साफ पानी के लिए नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और भविष्य को बचाने का संघर्ष बनता जा रहा है।
सात साल में 54 मौतें, सवालों के घेरे में व्यवस्था
कैंसर से 54 मौतों का ग्रामीणों का दावा इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पक्ष है। हालांकि मौतों और दूषित पानी के बीच प्रत्यक्ष चिकित्सकीय संबंध स्थापित करने के लिए वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी विस्तृत जांच आवश्यक है, लेकिन इतने बड़े दावे को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
सवाल यह है कि यदि वर्षों से ग्रामीण दूषित पानी, बीमारी और प्रदूषण की शिकायत कर रहे हैं तो समय रहते व्यापक वैज्ञानिक जांच क्यों नहीं हुई? भूजल की गुणवत्ता की नियमित निगरानी कितनी प्रभावी रही? औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट के निस्तारण की व्यवस्था की निगरानी किस स्तर पर हुई? और यदि नियमों का उल्लंघन हुआ तो जिम्मेदार इकाइयों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई? इन सवालों का जवाब केवल कागजी कार्रवाई से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाली कार्रवाई से मिलना चाहिए।
मानव जीवन और विकास में संतुलन जरूरी
गुजरात देश के सबसे औद्योगिक और विकसित राज्यों में गिना जाता है। औद्योगिक विकास, रोजगार और निवेश किसी भी राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। लेकिन विकास का अर्थ केवल कारखानों की संख्या, उत्पादन और निवेश का बढ़ना नहीं हो सकता। विकास की असली कसौटी यह भी है कि उसके बीच रहने वाले लोगों का जीवन कितना सुरक्षित और स्वस्थ है।
यदि किसी इलाके में उद्योग आर्थिक गतिविधियां बढ़ा रहे हों, लेकिन उसी क्षेत्र के लोगों को स्वच्छ पानी तक न मिले, खेत बर्बाद हो जाएं और बीमारियों का खतरा बढ़ता जाए, तो विकास के सामाजिक मूल्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
मानव जीवन और विकास को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना शासन की जिम्मेदारी है। उद्योग भी जरूरी हैं और पर्यावरण संरक्षण भी। रोजगार भी चाहिए और सुरक्षित पेयजल भी। लेकिन आर्थिक गतिविधियों की कीमत लोगों की सेहत और जिंदगी नहीं हो सकती।
प्रशासनिक संवेदनशीलता की परीक्षा
भटावाड़ा के ग्रामीणों, विशेषकर महिलाओं, ने कथित दूषित पानी की समस्या को लेकर फैक्ट्रियों के बाहर और धोलका में लंबे समय तक धरना-प्रदर्शन और भूख हड़ताल की। जब महिलाएं अपने घरों और बच्चों के स्वास्थ्य की चिंता लेकर सड़कों पर उतरती हैं, तो यह केवल विरोध नहीं बल्कि व्यवस्था से मदद की गुहार भी होती है।
प्रशासनिक संवेदनशीलता का अर्थ केवल शिकायत दर्ज करना नहीं है। इसका अर्थ है समस्या की गंभीरता को समझना, प्रभावित लोगों तक पहुंचना, वैज्ञानिक जांच कराना और दोष सामने आने पर प्रभावी कार्रवाई करना।
प्रशासन और गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को ग्रामीणों की ओर से कई शिकायतें दिए जाने की बात सामने आई है। इसके बाद सरकार की ओर से मेडिकल कैंप लगाकर जांच शुरू किए जाने की जानकारी भी है। यह कदम महत्वपूर्ण है, लेकिन ग्रामीणों की चिंता इससे आगे की है। उन्हें अस्थायी जांच नहीं, बल्कि स्थायी समाधान चाहिए।
विकसित राज्य में मानव मूल्य कहां हैं?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत तेज औद्योगिकीकरण और आर्थिक विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे में गुजरात जैसे औद्योगिक रूप से अग्रणी राज्य से पर्यावरणीय प्रबंधन और मानव सुरक्षा के उच्च मानकों की अपेक्षा स्वाभाविक है।
विकसित राज्य में मानव मूल्य केवल बड़े उद्योग, चौड़ी सड़कें और निवेश के आंकड़े नहीं हैं। मानव मूल्य का मतलब यह भी है कि किसी गांव का बच्चा सुरक्षित पानी पी सके, किसान अपनी जमीन पर खेती कर सके और किसी परिवार को बीमारी के डर में जिंदगी न बितानी पड़े।
यदि औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला अपशिष्ट नियमों के मुताबिक उपचारित और सुरक्षित तरीके से निस्तारित नहीं होता, तो उसका बोझ अंततः प्रकृति और आम नागरिक को उठाना पड़ता है। यह बोझ सबसे अधिक उन ग्रामीण परिवारों पर पड़ता है जिनके पास विकल्प सीमित होते हैं।
सरकारों की अनदेखी का सवाल
ग्रामीणों के आरोपों और सात वर्षों में 54 मौतों के दावे की स्वतंत्र जांच जरूरी है। सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्षेत्र में पिछले वर्षों के दौरान पानी की गुणवत्ता की कितनी जांच हुई, कितने नमूने लिए गए, किन औद्योगिक इकाइयों का निरीक्षण किया गया और नियमों के उल्लंघन की स्थिति में क्या कार्रवाई हुई।
साथ ही स्वास्थ्य विभाग को प्रभावित गांवों में कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों का वैज्ञानिक महामारी-विज्ञान आधारित अध्ययन कराना चाहिए, ताकि यह पता लगाया जा सके कि बीमारी की वास्तविक स्थिति क्या है और उसके संभावित कारण कौन-कौन से हैं।
किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले वैज्ञानिक प्रमाण जरूरी हैं, लेकिन जांच न होना अपने आप में समस्या को छोटा नहीं कर देता।
साल दर साल हो रही मौतों का गुनहगार कौन?
आखिर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि साल दर साल हो रही मौतों का गुनहगार कौन?
यदि औद्योगिक इकाइयों ने पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन किया है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। यदि निगरानी तंत्र ने अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभाई तो जवाबदेही तय होनी चाहिए। यदि शिकायतों के बावजूद कार्रवाई में देरी हुई है तो उसके कारण भी सामने आने चाहिए। लेकिन इससे पहले जरूरी है कि आरोपों की निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच हो। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को केवल किसी एक कारण से जोड़ देना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। इसलिए पानी, मिट्टी, भूजल, औद्योगिक अपशिष्ट और प्रभावित लोगों के स्वास्थ्य की व्यापक जांच ही वास्तविक तस्वीर सामने ला सकती है।
भटावाड़ा और आसपास के गांव आज जिस सवाल के साथ खड़े हैं, वह केवल गुजरात का सवाल नहीं है। यह उस विकास की दिशा का सवाल है जिसमें उद्योग और पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और मानव जीवन, निवेश और नागरिक सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा। कारखाने देश और राज्य की अर्थव्यवस्था को गति दे सकते हैं, लेकिन किसी भी आर्थिक प्रगति की अंतिम मंजिल इंसान का बेहतर जीवन ही होनी चाहिए। अगर विकास के रास्ते में वही इंसान असुरक्षित हो जाए जिसके लिए विकास की पूरी व्यवस्था बनाई गई है, तो विकास के अर्थ पर दोबारा विचार करना जरूरी हो जाता है।
भटावाड़ा के ग्रामीणों की आवाज इसलिए सुनी जानी चाहिए कि उसका जवाब केवल आज के संकट का समाधान नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि आने वाले वर्षों में विकास की कीमत कौन चुकाएगा—सरकार, उद्योग या फिर वह आम नागरिक जिसके पास अपने पानी, जमीन और जीवन के अलावा खोने के लिए कुछ नहीं है।
