- हिमपात में भारी कमी से जलस्रोत सूखने की कगार पर, विशेषज्ञों ने दी पर्यावरणीय संकट की चेतावनी
देहरादून@रा.वि.। उत्तराखंड की केदार घाटी के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में इस वर्ष फरवरी माह में असामान्य स्थिति देखने को मिल रही है। सामान्यतः माघ-फाल्गुन के समय बर्फ की मोटी चादर से ढकी रहने वाली पर्वत श्रृंखलाएं इस बार अधिकांश स्थानों पर बर्फ विहीन नजर आ रही हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ इसे वैश्विक तापवृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) और जलवायु परिवर्तन का प्रत्यक्ष संकेत मान रहे हैं।
फरवरी के अंतिम सप्ताह में ही पर्वतीय क्षेत्रों में मार्च-अप्रैल जैसी गर्माहट महसूस की जा रही है। दिन में तेज धूप और शुष्क हवाओं के कारण तापमान सामान्य से अधिक दर्ज किया जा रहा है। स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि दशकों बाद ऐसा समय आया है, जब इस मौसम में भी हिमालय की चोटियां सूनी दिखाई दे रही हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार हिमपात केवल सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की जीवनरेखा है। सर्दियों में जमी बर्फ धीरे-धीरे पिघलकर गर्मियों में जलस्रोतों को जीवित रखती है। इस वर्ष पर्याप्त हिमपात न होने से धारे, नौले और गदेरे जैसे पारंपरिक जल स्रोतों का जलस्तर घटने लगा है। कई मौसमी स्रोत समय से पहले ही सूखने लगे हैं, जिससे अप्रैल से जून के बीच पेयजल संकट गहराने की आशंका बढ़ गई है।
ग्लोबल वार्मिंग का असर कृषि और पशुपालन पर भी दिखाई दे रहा है। गेहूं, जौ, सरसों, मटर और मसूर जैसी फसलें शीतकालीन नमी पर निर्भर होती हैं, लेकिन भूमि में नमी की कमी से उत्पादन प्रभावित हो सकता है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में चारे का संकट भी उत्पन्न होने लगा है, जिससे पशुपालकों की चिंता बढ़ गई है।
पर्यावरणविदों का मानना है कि बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा और हिमपात में कमी सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन से जुड़े संकेत हैं। यह स्थिति प्रकृति के साथ बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप और अनियंत्रित विकास का परिणाम है। यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो हिमालयी जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र पर दीर्घकालिक दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि हिमालय में हो रहे ये बदलाव केवल क्षेत्रीय समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक जलवायु संकट का हिस्सा हैं। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में जल, कृषि और आजीविका पर गंभीर प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।
