Severe Heatwave in India Signals Climate Crisis as Temperatures Cross 45°C

Gyanendra Rawat
वर्तमान में देश हीटवेव की भीषण चपेट में है। असलियत यह है कि इस बार अप्रैल महीने में ही आसमान से आग बरस रही है। देश के कई शहरों में पारा 45 डिग्री के पार पहुंच गया है जिसके और बढ़ने की आशंका है।अप्रैल महीने के तीसरे हफ्ते में ही लू का प्रचंड रूप देखने को मिल रहा है। दिन तो दिन अब तो रातें भी तपिश का रिकार्ड तोड़ रही हैं। हालात की भयावहता का मंजर यह है कि दुनिया के सबसे गर्म शहरों में 19 भारत के हैं। यह स्थिति बेहद गंभीर सकेत दे रही है। इतनी बड़ी तादाद में एकसाथ दुनिया के इतने शहरों का अत्याधिक गर्म होना जलवायु परिवर्तन की सीधा-साधा संकेत है और यही नहीं इसे सामान्य गर्मी मानकर दरगुजर भी नहीं किया जा सकता बल्कि यह भविष्य के खतरनाक ट्रेंड की एक झलक मात्र है। सच कहें तो इससे हीटवेव की तीव्रता और आवृत्ति दोनों दिनोंदिन बढ़ती चली जायेगी। वह बात दीगर है कि मानसून के चलते इसमें कुछ राहत भले मिल जाये लेकिन इसकी तीव्रता समय के साथ बढ़ती ही चली जायेगी।सच तो यह है कि देश में हीटवेव कहें, उष्ण लहर कहें या फिर लू कहें की तीव्रता और घातकता में दिनोंदिन तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। आज स्थिति यह है कि उत्तर भारत के अनेक शहरों में तापमान कहीं 43 तो कहीं 44.5 डिग्री सेल्सियस से भी पार कर गया है।
उत्तर प्रदेश के आठ जिलों में पारा 44 पार कर गया है। तपिश का आलम यह है कि उत्तर भारत के राज्यों में वह चाहे दिल्ली हो, पंजाब हो,हरियाणा हो, राजस्थान हो, बिहार हो, झारखंड हो, मध्य प्रदेश हो,हिमाचल हो, उत्तराखंड हो आदि में खासकर झांसी, प्रयागराज, वाराणसी, कानपुर, बांदा, इंदौर, रायपुर, कोटा, चुरू,गया, कैमूर, रोहतास, बक्सर, औरंगाबाद से लेकर वह तेलंगाना तक पारा 44 डिग्री सेल्सियस तक पार होने और लू के प्रकोप को देखते हुए स्कूलों का समय भी बदलना पड़ा है।उत्तर प्रदेश और राजस्थान में तो पारा 46 तक पहुंच गया है। मौसम विभाग की भविष्यवाणी की मानें तो आने वाले दिनों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस को पार कर जायेगा। चिकित्सा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अत्यधिक गर्मी के गंभीर जानलेवा परिणाम होंगे। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के सलाटा इंस्टीट्यूट फार क्लाइमेट एंड सस्टेनेबिलिटी के शोधपत्र की मानें तो जलवायु परिवर्तन के दौर के चलते भारत में गर्मी का अभी सबसे बुरा दौर आने वाला है। शोध-अध्ययन के अनुसार साल 1980-90 और 2015 से 2024 के बीच भारत में तापमान 0.88 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है।इसके लिए वायु प्रदूषण को जिम्मेदार माना गया है। निकट भविष्य में इसका दायरा और भी अधिक तेजी से बढ़ेगा। यही चिंता का विषय है कि तब क्या होगा?
क्लाईमामीटर की रिपोर्ट में हुआ खुलासा
दुनिया के शोध-अध्ययन इसका प्रमाण है कि मौजूदा हीटवेव पहले की तुलना में चार डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म हो चुकी है। क्लाईमामीटर की रिपोर्ट में 1950 के बाद से अबतक हीटवेव की भयावहता और उसके कारणों का विश्लेषण करने के बाद खुलासा किया गया है कि जो हीटवेव साल 1950 और साल 2000 के बीच चलती थी, उसमें और मौजूदा हीटवेव में काफी अंतर आ चुका है। इस निष्कर्ष तक पहुंचने में यूरोपीय मौसम विज्ञान एजेंसी कापरनिक्स के ईआरए आंकड़ों के इस्तेमाल किये जाने के बाद कहा गया है कि मौजूदा हीटवेव उसकी तुलना में चार डिग्री और ज्यादा गर्म हो चुकी है। इसके चलते मानव स्वास्थ्य के लिए भीषण खतरा पैदा हो गया है। इसके लिए मानव जनित जलवायु परिवर्तन पूरी तरह जिम्मेदार है। गौरतलब यह है कि इसमें प्राकृतिक कारणों से उपजे जलवायु परिवर्तन की भूमिका लगभग नगण्य ही है। बहरहाल रिपोर्ट में भारत के संदर्भ में हीटवेव के साथ-साथ मौसम में भी कई बदलाव देखे जाने का उल्लेख किया गया है। इनमें सतह के वायु दबाव में बढ़ोतरी, हवाओं की गति और तापमान के पैटर्न मैं हुए काफी बदलावों का उल्लेख है। रिपोर्ट की मानें तो इन बदलावों में नमी का बढ़ना, हवाओं की गति में यकायक कमी और सर्दी प्रमुख है। इसके अलावा पिछले 80 बर्षों में दुनिया के महानगरों में अत्याधिक गर्मी का अनुभव करने वाले दिनों की तादाद भी तीन गुणा हो गयी है। दरअसल 1940 के दशक में औसतन वैश्विक समुद्री सतह पर सालाना लगभग 15 दिन अत्याधिक गर्मी देखी जाती थी लेकिन वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण आज यह आंकड़ा बढ़कर 50 दिन प्रति वर्ष से भी ज्यादा हो गया है। प्रोसीडिंग्स आफ द नेशनल एकेडेमी आफ साइंसेज नामक जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक अब समुद्री हीटवेव लम्बे समय तक सामान्य से काफी ऊपर रहती है। यह भी कि वैश्विक तापमान बढ़ोतरी के चलते अत्याधिक समुद्री गर्मी की घटनाएं लम्बे समय तक बनी रहती हैं।
हर साल दुनिया में 1.53 लाख से ज्यादा लोगों की मौत लू के कारण
इसमें दो राय नहीं है कि तापमान में बढ़ोतरी से घातक लू चलने की घटनाओं में बीते दशकों में तेजी से वृद्धि हुई है। बीते दो दशक तो लू से मरने वालों की तादाद में हुई बढ़ोतरी के जीते-जागते सबूत हैं। हर साल दुनिया में 1.53 लाख से ज्यादा लोगों की मौत लू के कारण होती है। इसमें पांचवें हिस्से से अधिक मौतें भारत में होती हैं। भारत के बाद चीन और रूस में लू से जुड़ी मौतें सर्वाधिक हैं। यहां करीब 14 फीसदी मौतें हुयी हैं। वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार पिछले तीन दशक में हर साल कुल 1,53,078 लोगों की मौत लू से हुई है। यह भी कि हर साल गर्मियों में होने वाली कुल मौतों में से लगभग आधी एशिया से और 30 फीसदी से अधिक यूरोप में हुई हैं। जलवायु परिवर्तन ने अप्रैल में पूरे एशिया में हीटवेव की तीव्रता को काफी बढा़ दिया है। इस अवधि में अरबों लोगों को प्रभावित किया है। स्विट्ज़रलैंड स्थित ईटीएच ज्यूरिख यूनिवर्सिटी के अध्ययन से यह खुलासा हुआ है कि दुनिया में यदि भविष्य में इसी प्रकार प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों की घटनाओं में और बढ़ोतरी हुयी तो उससे लू सम्बन्धी मामलों में मृत्यु दर बढ़ने की और आशंका है। बीते 20 सालों में यह आंकड़ा करीब एक लाख तक पहुंच गया है। 2013 से यूरोप, दक्षिण एशिया, लैटिन अमेरिका, अमेरिका, कनाडा सहित दुनिया के 47 देशों के 748 शहरों में रोजाना गर्मी से सम्बन्धित मृत्यु दर सम्बन्धी एकत्रित आंकड़ों में यह तथ्य सामने आया है कि लू की घटनाओं में कहीं भी कमी नहीं हुयी है और वहां लू से मरने वालों की तादाद में बढ़ोतरी ही हुई है। वैज्ञानिकों ने कार्बन डाई आक्साइड में हुई रिकार्ड बढ़त और तापमान में लगातार होती बढ़ोतरी के चलते हीटवेव की भयावहता की आशंका व्यक्त की है।
हीटवेव की तीव्रता और घातकता की जद में देश की 80 फीसदी आबादी
दरअसल हीटवेव की तीव्रता और घातकता की जद में देश की 80 फीसदी आबादी और 90 फीसदी क्षेत्रफल आने की आशंका व्यक्त की गयी है। सबसे बडा़ खतरा यह है कि यदि हीटवेव से निपटने की दिशा में त्वरित कार्रवाही नहीं की गयी तो भारत को सतत विकास लक्ष्य यानी एसडीजी को हासिल करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। क्योंकि हीटवेव की स्थिति मानव शरीर के लिए अत्याधिक खतरनाक होती है। इससे डिहाईड्रेशन, हीटस्ट्रोक और मौत भी हो सकती है। इसकी चपेट में बच्चे, 80 से ज्यादा उम्र वाले बुजुर्ग, विशेष रूप से महिलाएं, फेफडो़ं की पुरानी बीमारी वाले, निर्माण और श्रम से जुडे़ लोग ज्यादा आते हैं। इन लोगों पर हीटवेव का जोखिम ज्यादा रहता है। फिर वह जो पहले से ही स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं, उनको ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है। सच यह है कि बीते बरसों में हर महाद्वीप को हीटवेव ने प्रभावित किया है। इससे जंगलों में आग की घटनाओं में बेतहाशा बढो़तरी हुई है। साल 1992 से लेकर अभी तक लू के चलते तकरीब 24 हजार से अधिक लोगों की मौतें हुयी हैं। आने वाले सालों में 60 करोड़ लोग इससे सर्वाधिक प्रमावित होंगे। इससे 31 से 48 करोड़ लोगों के जीवन की गुणवत्ता में कमी दर्ज की जायेगी। विश्व मौसम विज्ञान संगठन डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट की मानें तो बीता दशक धरती पर अभी तक का सबसे गरम दशक रहा है। यह वर्ष भी गर्मी का रिकार्ड तोड़ देगा। 2027 तक पूरी दुनिया में रिकार्ड तोड़ गर्मी की आशंका है। चिंता की बात यह है कि यदि तापमान वृद्धि की दर पर अंकुश नहीं लगा तो सदी के अंत तक गर्मी से 1.5 करोड़ लोग मौत के मुहाने तक पहुंच जायेंगे।
तेल और गैस का अत्याधिक मात्रा में उत्सर्जन बड़ा कारण
कोलंबिया यूनीवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने कहा है कि दुनिया की प्रमुख जीवाश्म ईंधन कंपनियों द्वारा तेल और गैस का अत्याधिक मात्रा में उत्सर्जन वह अहम कारण है जिसके चलते उत्सर्जन स्तर यदि 2050 तक यही रहा तो 2100 तक गर्मी अपने घातक स्तर तक पहुंच जायेगी जिसका नतीजा लाखों लोगों की मौत के रूप में होगा। यह भी कि प्रत्येक मिलियन टन कार्बन में बढो़तरी से दुनिया भर में 226 अतिरिक्त हीटवेव की घटनाओं में बढो़तरी होगी। संयुक्त राष्ट्र की जलवायु समिति के अनुसार यदि धरती के तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस पर रोकना है तो 2030 तक कार्बन उत्सर्जन 43 फीसदी तक घटाना होगा। क्योंकि धरती के गर्म होने की रफ्तार अनुमान से कहीं ज्यादा है। अहम सवाल कार्बन उत्सर्जन कम करने का है, यदि ऐसा नहीं हुआ जिसकी संभावना अधिक है और उस दशा में सदी के आखिर तक धरती का तापमान बढ़कर चार डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जायेगा। उस दशा में धरती रहने काबिल बची रह पायेगी? चिंता की असली वजह यही है।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।)
