- होर्मुज़ में तनाव, कतर की गैस बंदी और महंगा होता तेल , क्या बढ़ेगी भारत में महंगाई की आग?
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को झकझोर दिया है। ईरान और इज़रायल के बीच टकराव तथा अमेरिका की सक्रिय भूमिका ने तेल, गैस और समुद्री आपूर्ति शृंखला पर गहरा असर डाला है। इसका सीधा प्रभाव भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ रहा है।
कतर की एलएनजी सुविधाएं बंद, भारत पर सीधा असर
भारत के लिए बड़ी चिंता की बात यह है कि कतर ने अपनी प्रमुख गैस उत्पादन इकाई रास लाफान इंडस्ट्रियल सिटी की एलएनजी सुविधाओं को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है। यह क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े तरलीकृत प्राकृतिक गैस निर्यात केंद्रों में से एक है। ईरान के ड्रोन हमलों के बाद रास लाफान और मेसाइद औद्योगिक क्षेत्रों में उत्पादन गतिविधियां प्रभावित हुई हैं।
कतर से आने वाली एलएनजी भारत के उर्वरक, पेट्रोकेमिकल, पावर और भारी उद्योग क्षेत्रों के लिए जीवनरेखा मानी जाती है। आपूर्ति में कटौती के संकेत मिलते ही आयातक कंपनियों ने ग्राहकों को सीमित गैस आपूर्ति की सूचना देना शुरू कर दिया है।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य में संकट, परिवहन लागत में उछाल
ऊर्जा संकट का दूसरा बड़ा पहलू है होर्मुज़ जलडमरूमध्य, जो वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति की मुख्य धुरी है। दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल एवं गैस इसी मार्ग से गुजरता है। भारत का करीब 60 प्रतिशत एलएनजी और लगभग आधा कच्चा तेल इसी समुद्री रास्ते से आता है।
तनाव बढ़ने के कारण शिपिंग बीमा प्रीमियम, माल भाड़ा और परिवहन दरों में तेज वृद्धि हो रही है। इससे आयातित ऊर्जा की लागत और बढ़ सकती है, जिसका सीधा असर घरेलू ईंधन कीमतों और महंगाई पर पड़ेगा।
80 डॉलर के पार कच्चा तेल, 100 डॉलर का खतरा
खाड़ी संकट के बीच ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी है और कुछ बाजारों में 82 डॉलर तक जा चुकी है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब या उससे ऊपर जा सकती हैं।
ऐसी स्थिति में भारत के लिए आयात बिल बढ़ना तय है, जिससे चालू खाता घाटा, रुपये पर दबाव और महंगाई दर में वृद्धि की आशंका बढ़ सकती है।
अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है व्यापक प्रभाव
ऊर्जा कीमतों में उछाल का असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा। उर्वरक, बिजली उत्पादन, सीएनजी, रसोई गैस और औद्योगिक उत्पादन की लागत में वृद्धि से आम उपभोक्ता से लेकर उद्योग जगत तक सभी प्रभावित हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों, रणनीतिक भंडार और ऊर्जा विविधीकरण की दिशा में त्वरित कदम उठाने होंगे।
खाड़ी क्षेत्र में जारी अस्थिरता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार की हलचल का सीधा प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था और आम नागरिक की जेब पर पड़ सकता है।
