लेखक: मोहित चौहान
आज इक्कीसवीं सदी का भारत विकास की नई इबारत लिख रहा है। एक्सप्रेसवे, मेट्रो, स्मार्ट सिटी और गगनचुंबी इमारतें देश की प्रगति का प्रतीक बन चुकी हैं। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक चिंताजनक सच्चाई भी छिपी है, विकास की कीमत हमारी हरियाली चुका रही है। अकेले उत्तर प्रदेश में सड़क, रेलवे और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए हर वर्ष लाखों पेड़ काटे जा रहे हैं।
वैश्विक संस्था एफएओ (FAO) की ग्लोबल फॉरेस्ट रिसोर्सेज असेसमेंट 2025 रिपोर्ट में भारत को वन क्षेत्र बढ़ाने वाले देशों में तीसरा स्थान मिला है। यह उपलब्धि सराहनीय है, लेकिन सवाल यह है कि क्या कागजों पर दर्ज हरियाली वास्तव में धरातल पर भी दिखाई देती है?
करोड़ों पौधे, अरबों का बजट
हर वर्ष मानसून के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार “एक पेड़ मां के नाम” जैसे अभियानों के तहत 35 से 36 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य तय करती है। इस पर लगभग 2,500 से 3,000 करोड़ तक खर्च किए जाते हैं। इसके अलावा, किसी विकास परियोजना के लिए पेड़ काटने पर ‘कैम्पा’ (CAMPA) फंड के तहत प्रति पेड़ कई नए पौधे लगाने और वर्षों तक उनकी देखभाल का प्रावधान भी है।
कागजों पर यह व्यवस्था पर्यावरण संरक्षण का मजबूत मॉडल दिखाई देती है।
धरातल पर क्यों नहीं दिखती हरियाली?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि हर वर्ष करोड़ों पौधे लगाए जा रहे हैं तो वे विशाल वृक्षों में क्यों नहीं बदल रहे?
हकीकत यह है कि कई स्थानों पर वृक्षारोपण केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है। मानसून में पौधे लगाकर फोटो खिंचवा लिए जाते हैं, लेकिन बाद में उनकी सिंचाई, सुरक्षा और देखभाल की व्यवस्था नहीं होती। परिणामस्वरूप अधिकांश पौधे कुछ ही महीनों में सूख जाते हैं। अगले वर्ष उसी स्थान पर फिर नए पौधे लगा दिए जाते हैं और नया बजट खर्च हो जाता है।
हालांकि हाल के वर्षों में जियो-टैगिंग, ड्रोन और सैटेलाइट मॉनिटरिंग जैसी तकनीकों से पारदर्शिता बढ़ी है, लेकिन सौ वर्ष पुराने एक विशाल वृक्ष की भरपाई दस छोटे पौधे तुरंत नहीं कर सकते।
बदलता मौसम दे रहा चेतावनी
पेड़ों की लगातार कटाई का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। मार्च से ही भीषण गर्मी शुरू हो जाती है और कई क्षेत्रों में तापमान 48 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। वसंत ऋतु लगभग गायब हो चुकी है, सर्दियां छोटी होती जा रही हैं और मानसून का स्वरूप भी अस्थिर हो गया है। कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ता है तो कहीं कुछ घंटों की बारिश ही बाढ़ और तबाही का कारण बन जाती है।
पेड़ केवल लकड़ी नहीं हैं। वे धरती के प्राकृतिक एयर कंडीशनर, कार्बन अवशोषक और जल संरक्षण के सबसे बड़े साधन हैं। इनके कम होने से शहरों में “अर्बन हीट आइलैंड” की समस्या बढ़ रही है और भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है।
सरकार नहीं, समाज भी निभाए जिम्मेदारी
पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार या वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं हो सकता। इसे जन आंदोलन बनाना होगा। जब तक देश के 140 करोड़ नागरिक और उत्तर प्रदेश के 25 करोड़ लोग इस अभियान में भागीदार नहीं बनेंगे, तब तक कोई भी नीति पूरी तरह सफल नहीं हो सकती।
प्रोत्साहन आधारित मॉडल की जरूरत
अब समय आ गया है कि दंडात्मक व्यवस्था के साथ-साथ प्रोत्साहन आधारित नीति भी अपनाई जाए।
- जो नागरिक अपने घर के बाहर पेड़ लगाकर उसे जीवित रखें, उन्हें हाउस टैक्स में रियायत दी जाए।
- नए भवनों के नक्शे तभी स्वीकृत हों, जब वृक्षारोपण के लिए पर्याप्त स्थान सुनिश्चित किया जाए।
- स्कूल और कॉलेजों में छात्रों को पौधों के संरक्षण पर “ग्रीन क्रेडिट” या अतिरिक्त अंक दिए जाएं।
- “स्मृति वन” विकसित किए जाएं, जहां लोग जन्मदिन, विवाह या पूर्वजों की स्मृति में पौधे लगाकर उनकी देखभाल करें।
सिर्फ पौधे लगाना नहीं, उन्हें पेड़ बनाना जरूरी
विकास आवश्यक है और कई बार पेड़ काटना भी मजबूरी बन जाता है। लेकिन उससे कहीं अधिक जरूरी है नए पौधों को जीवित रखना और उन्हें वृक्ष बनने तक संरक्षण देना।
सरकार नीति बना सकती है, तकनीक के माध्यम से निगरानी कर सकती है, लेकिन पौधों को पानी देने, उनकी सुरक्षा करने और उन्हें बचाने की जिम्मेदारी समाज को ही निभानी होगी।
यदि आज भी हम केवल कागजी हरियाली पर संतुष्ट रहे, तो आने वाले वर्षों में कंक्रीट के जंगल तो हमारे पास होंगे, लेकिन उनमें सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा शायद नहीं होगी। यही समय है जब विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करने का संकल्प लिया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को रहने योग्य, हरित और सुरक्षित भारत मिल सके।

