Experts stress scientific research, traditional knowledge and community participation to conserve Uttarakhand’s bugyals as a vital Himalayan natural and cultural heritage.
- सूबे के वन मंत्री बोले, हर साल मनाया जाएगा बुग्याल दिवस
- संरक्षण का आधार वैज्ञानिक शोध, पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय समुदायों की भागीदारी
देहरादून@Rashtriya Vichar। उत्तराखंड के बुग्याल सिर्फ ऊंचाई वाले क्षेत्रों में फैले घास के मैदान नहीं, बल्कि हिमालय की प्राकृतिक संपदा, लोक परंपराओं, जैव विविधता और सदियों पुराने सामुदायिक जीवन से जुड़ी अमूल्य धरोहर हैं। इनके संरक्षण के लिए वैज्ञानिक शोध के साथ पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को मजबूत करना जरूरी है। बुग्याल संरक्षण दिवस के अवसर पर बुधवार को संस्कृति विभाग ऑडिटोरियम, देहरादून में आयोजित सेमिनार में विशेषज्ञों और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों ने इस दिशा में व्यापक मंथन किया।

मैती संस्था, उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकॉस्ट) और हेस्को के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सेमिनार का विषय ‘उत्तराखंड के अल्पाइन घास के मैदानों (बुग्यालों) का संरक्षण : वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पारंपरिक ज्ञान एवं संरक्षण कार्यवाही’ रहा। कार्यक्रम का उद्देश्य बुग्यालों के संरक्षण से जुड़े वैज्ञानिक शोध, पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय अनुभव और सरकारी प्रयासों को एक साझा मंच पर लाना था। मुख्य अतिथि वन, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि बुग्यालों के संरक्षण के प्रति जनजागरूकता बढ़ाने के लिए उत्तराखंड वन विभाग द्वारा प्रत्येक वर्ष बुग्याल दिवस मनाया जाएगा। उन्होंने संरक्षण को सरकार, स्थानीय समुदायों और सामाजिक-पर्यावरणीय संस्थाओं के सामूहिक प्रयास से जोड़ने पर जोर दिया।
संरक्षण को स्थानीय अनुभव व नीति जरूरी: मैती संस्था के संस्थापक एवं सचिव पद्मश्री डॉ. कल्याण सिंह रावत ने कहा कि बुग्याल उत्तराखंड की प्राकृतिक और सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं। इनके संरक्षण में स्थानीय लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण है। उन्होंने पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय अनुभवों को संरक्षण नीति से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया।

विशेषज्ञों ने समझाया पारिस्थितिकी महत्व: सेमिनार में पूर्व निदेशक भारतीय वन्यजीव संस्थान डॉ. जीएस रावत ने बुग्यालों के पारिस्थितिक महत्व और संरक्षण की चुनौतियों पर विचार रखे। उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. गजेन्द्र सिंह ने अंतरिक्ष एवं वैज्ञानिक तकनीक के माध्यम से बुग्यालों की निगरानी और अध्ययन की संभावनाओं की जानकारी दी। मानसखंड विज्ञान केंद्र के एमेरिटस वैज्ञानिक डॉ. जीसीएस नेगी ने हिमालयी पर्यावरण और स्थानीय ज्ञान के महत्व पर प्रकाश डाला। यूकॉस्ट के संयुक्त निदेशक डॉ. डीपी उनियाल ने संरक्षण में विज्ञान एवं तकनीकी दृष्टिकोण की भूमिका बताई।
लोगों को जोड़ा जाए: पद्म भूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण को समय की बड़ी जरूरत बताया। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा तभी प्रभावी होगी, जब स्थानीय स्तर पर लोगों को संरक्षण से जोड़ा जाए। यूकॉस्ट के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत ने विज्ञान और तकनीकी नवाचार को बुग्याल संरक्षण का महत्वपूर्ण आधार बताया। मुख्य वन संरक्षक-पर्यावरण सुशांत कुमार पटनायक ने बुग्यालों के पर्यावरणीय महत्व के साथ प्रभावी संरक्षण कार्रवाई और सामुदायिक सहभागिता की आवश्यकता पर बल दिया।

पीढ़ियों के लिए संजोए पारंपरिक विरासत: वक्ताओं ने कहा कि बुग्याल जल स्रोतों, जैव विविधता, हिमालयी पारिस्थितिकी, स्थानीय आजीविका और सांस्कृतिक परंपराओं से गहराई से जुड़े हैं। इसलिए इनका संरक्षण केवल पर्यावरण बचाने का अभियान नहीं, बल्कि उत्तराखंड की प्राकृतिक और पारंपरिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने का संकल्प भी है।
संरक्षण में योगदान देने वालों का सम्मान
कार्यक्रम में पर्यावरण, विज्ञान, शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘गिरि गंगा गौरव सम्मान’ और ‘मैती सम्मान’ प्रदान किए गए। गिरि गंगा गौरव सम्मान से डॉ. जीसीएस नेगी, प्रो. दुर्गेश पंत और अधिवक्ता ललित जोशी को सम्मानित किया गया। वहीं पर्यावरण संरक्षण में योगदान के लिए पवन शर्मा, चन्दन नेगी, शम्भू प्रसाद नौटियाल, प्रताप पोखरियाल, जगदम्बा प्रसाद मैठाणी, मनोज ध्यानी और संदीप गुसाईं को मैती सम्मान प्रदान किया गया। कार्यक्रम का संचालन यूकॉस्ट के वैज्ञानिक डॉ. भवतोष शर्मा ने किया।
इस अवसर पर पद्मश्री बसंती बिष्ट, डॉ. राजेंद्र राणा, संतोष रावत, चंद्रावती असवाल, संगीता रावत, रमेश रावत, मंजीत नेगी सहित अनेक पर्यावरणविद्, वैज्ञानिक, शिक्षाविद्, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रकृति प्रेमी मौजूद रहे।
