- आपदा के बाद वादे हवा-हवाई? धारचूला में पुनर्वास की राह देख रहे 84 पीड़ित परिवारों का पैदल मार्च ऐलान
नदीम परवेज @ धारचूला (पिथौरागढ़)।
सीमांत क्षेत्र की ग्राम पंचायत छलमाछिलासो में वर्ष 2016-17 की भीषण आपदा का जख्म आज भी हरा है। उस आपदा में जिन 136 परिवारों को प्रशासन ने 2019 में विस्थापन योग्य माना था, उनमें से अब तक केवल 52 परिवारों का ही पुनर्वास हो पाया है। शेष 84 परिवार आज भी स्थायी विस्थापन की प्रतीक्षा में असुरक्षित हालात में जीवन बिताने को मजबूर है।

सात वर्षों से अस्थायी आश्रयों में रह रहे इन परिवारों की पीड़ा केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक भी है। बरसात आते ही डर लौट आता है, पहाड़ी दरकने की आशंका हर रात की नींद छीन लेती है। बच्चों की पढ़ाई बाधित है, महिलाओं और बुजुर्गों को मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
ग्राम प्रधान पूजा वर्मा द्वारा जिलाधिकारी पिथौरागढ़ को भेजे गए पत्र में स्पष्ट कहा गया है कि वैज्ञानिकों द्वारा भूमि चयन और जांच की प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है। इसके बावजूद प्रशासनिक स्तर पर आकलन रिपोर्ट आगे नहीं बढ़ाई गई। ग्रामीणों का सवाल है कि जब तकनीकी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, तो आखिर 84 परिवारों की जिंदगी किस फाइल में अटकी हुई है?
ग्रामीणों का आरोप है कि हर बार आश्वासन मिलता है, लेकिन धरातल पर कार्रवाई नहीं होती। आपदा के बाद राहत और पुनर्वास के बड़े-बड़े दावे किए गए, मगर आज भी दर्जनों परिवार असुरक्षित ढलानों के नीचे, अस्थायी छतों के सहारे जिंदगी काट रहे हैं।
ग्राम सभा ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं की गई तो शीघ्र आपदा पीड़ित परिवार गांव से तहसील मुख्यालय तक पैदल मार्च करेंगे और अनिश्चितकालीन धरने पर बैठेंगे। ग्रामीणों का कहना है कि अब इंतजार की सीमा समाप्त हो चुकी है और उन्हें अपने हक के लिए सड़कों पर उतरना पड़ेगा।
सीमांत क्षेत्र का यह मामला न केवल पुनर्वास की धीमी प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि आपदा प्रबंधन तंत्र की संवेदनशीलता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। सात वर्षों से राहत की आस लगाए बैठे इन 84 परिवारों की कहानी यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आपदा के बाद पुनर्वास सिर्फ कागजी कार्यवाही बनकर रह गया है?
