- दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में बार्लोगंज एंड बियॉन्ड का लोकार्पण
देहरादून,रा.वि.। दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के सभागार में प्रो. (डॉ.) बीके जोशी की संस्मरणों पर आधारित पुस्तक बार्लोगंज एंड बियॉन्ड का लोकार्पण एवं विचार-विमर्श गरिमामय वातावरण में आयोजित किया गया। यह आयोजन न केवल एक पुस्तक विमोचन था, बल्कि शिक्षा, बौद्धिक जिज्ञासा और संस्थान-निर्माण की दीर्घ यात्रा का उत्सव भी बन गया।

कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध अंग्रेज़ी कवि अरविंद के मेहरोत्रा, वरिष्ठ लेखक एलन सीली तथा लेखिका मंजरी मेहता ने पुस्तक पर गहन चर्चा की। संवाद का संचालन पत्रकार रंजोना बनर्जी ने किया। वक्ताओं ने पुस्तक को एक ऐसी आत्मकथा बताया जो हिमालय की गोद में बसे मसूरी के बार्लोगंज से आरंभ होकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शैक्षिक एवं नीतिगत संस्थानों तक की व्यापक यात्रा को संवेदनशीलता और स्पष्टता के साथ प्रस्तुत करती है।

प्रो. बीके जोशी की यह कृति बचपन की स्मृतियों, शिक्षा, बौद्धिक जिज्ञासा, सार्वजनिक सेवा और संस्थान-निर्माण के अनुभवों का सजीव दस्तावेज है। इसमें महत्वाकांक्षाओं, असफलताओं, मित्रताओं और मार्गदर्शकों के साथ-साथ ज्ञान-केंद्रों के निर्माण में लगे श्रम और प्रतिबद्धता का मार्मिक चित्रण है।
प्रख्यात इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने इस पुस्तक को “एक विद्वान-से-संस्थान-निर्माता की आकर्षक आत्मकथा” बताते हुए इसकी व्यापक भौगोलिक और विषयगत परिधि की सराहना की है। उन्होंने विशेष रूप से हिमालय में बिताए आदर्श बचपन और एक अग्रणी पुस्तकालय-सह-शोध केंद्र के निर्माण की कथा को प्रेम और अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण बताया।
कार्यक्रम का संचालन निकोलस हॉफलैण्ड ने किया। प्रारंभ में टेथिस बुक्स की ओर से नीता गुप्ता और दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र की ओर से चंद्रशेखर तिवारी ने अतिथियों का स्वागत किया। चर्चा के दौरान एलन सीली और प्रो. मेहरोत्रा ने पुस्तक के अंशों का वाचन भी किया, जिसने श्रोताओं को विशेष रूप से प्रभावित किया।
समारोह में साहित्यकारों, शिक्षाविदों, पूर्व वरिष्ठ प्रशासकों, पुस्तकालय के पदाधिकारियों, युवा पाठकों और शहर के प्रबुद्ध जनों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। अंत में प्रश्नोत्तर सत्र में श्रोताओं ने प्रो. जोशी से सीधे संवाद कर पुस्तक के विभिन्न पहलुओं पर जिज्ञासाएं साझा कीं।
यह आयोजन दून की समृद्ध साहित्यिक और बौद्धिक परंपरा को एक बार फिर रेखांकित करता नजर आया, जहां एक आत्मकथा के बहाने ज्ञान, संस्थान-निर्माण और सार्वजनिक जीवन के मूल्यों पर सार्थक विमर्श हुआ।
