‘Apni Ganna Apna Gaon’ Campaign Gains Momentum to Save Uttarakhand’s Mountain Villages Before 2027 Census
- 2027 की जनगणना में गांवों में पंजीकरण की अपील
- जनगणना में गांव की आबादी बढ़ाने को जागरूकता अभियान तेज
देहरादून@Rashtriy Vichar।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन के कारण खाली होते गांवों की चिंता अब सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर एक बड़े अभियान का रूप ले चुकी है। आगामी वर्ष 2027 में प्रस्तावित जनगणना को देखते हुए राज्यभर में ‘अपनी गणना-अपना गांव’ अभियान तेजी से गति पकड़ रहा है। अभियान का उद्देश्य उन लोगों को जागरूक करना है, जो रोजगार, शिक्षा या अन्य कारणों से अस्थायी रूप से शहरों अथवा राज्य से बाहर रह रहे हैं, ताकि वे अपनी जनगणना अपने मूल गांव में कराकर पर्वतीय क्षेत्रों की वास्तविक आबादी को सुरक्षित रख सकें।
लगातार चल रहा बैठकों का दौर: इस अभियान के मुख्य संयोजक की जिम्मेदारी भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं दर्जा राज्यमंत्री जोत सिंह बिष्ट को सौंपी गई है। उनके नेतृत्व में एक विशेष टीम का गठन किया गया है, जो राज्य के विभिन्न जिलों, मैदानी क्षेत्रों और प्रवासी उत्तराखंडियों के बीच लगातार बैठकें और जनसंपर्क अभियान चला रही है। टीम लोगों को समझा रही है कि यदि जनगणना के दौरान अधिकांश लोग अपने वर्तमान शहरों में ही दर्ज हो गए, तो पर्वतीय गांवों की आधिकारिक जनसंख्या में भारी गिरावट दर्ज होगी।

विकास के लिए जनसंख्या के आकड़े अहम: अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि सरकारी योजनाओं, बजट आवंटन और विकास कार्यों का आधार जनसंख्या के आंकड़े होते हैं। यदि गांवों की आबादी कागजों में कम दिखाई देगी, तो वहां शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाओं के लिए मिलने वाले संसाधन भी घट सकते हैं। इसका सीधा असर पहले से पलायन की मार झेल रहे पर्वतीय क्षेत्रों के विकास पर पड़ेगा।
अभियान के तहत लोगों से अपील की जा रही है कि वे जनगणना अधिकारियों के समक्ष अपने मूल गांव को ही स्थायी निवास के रूप में दर्ज कराएं। इससे गांवों की जनसंख्या के वास्तविक आंकड़े सामने आएंगे और भविष्य में विकास योजनाओं का लाभ भी उन क्षेत्रों तक प्रभावी ढंग से पहुंच सकेगा। इस जनजागरण अभियान में बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि और प्रवासी उत्तराखंडी भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
अभियान को सांसद अनिल बलूनी और अजय टम्टा का मिला समर्थन
उत्तराखंड के पर्वतीय गांवों की घटती जनसंख्या और लगातार हो रहे पलायन के बीच ‘मेरी गणना–मेरा गांव’ अभियान को अब जनप्रतिनिधियों का भी समर्थन मिलने लगा है। अभियान को व्यापक स्तर पर सफल बनाने के उद्देश्य से हाल ही में अभियान के मुख्य संयोजक एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता तथा दर्जा राज्यमंत्री जोत सिंह बिष्ट के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी तथा केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग राज्य मंत्री अजय टम्टा से अलग-अलग मुलाकात कर अभियान की रूपरेखा से अवगत कराया और सहयोग का आग्रह किया।
प्रतिनिधिमंडल ने दोनों नेताओं को बताया कि वर्ष 2027 की जनगणना उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यदि रोजगार, शिक्षा और अन्य कारणों से शहरों में रह रहे उत्तराखंड मूल के लोग अपनी गणना वहीं कराते हैं, तो गांवों की आधिकारिक आबादी लगातार घटती जाएगी। इससे सरकारी योजनाओं, विकास कार्यों और संसाधनों के आवंटन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

सांसद अनिल बलूनी ने अभियान की सराहना करते हुए इसे उत्तराखंड के दीर्घकालिक हित से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रयास बताया और हरसंभव सहयोग का भरोसा दिलाया। वहीं केंद्रीय राज्य मंत्री अजय टम्टा ने भी कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों के संतुलित विकास के लिए सही जनसंख्या आंकड़े आवश्यक हैं और इस दिशा में जनजागरूकता अभियान बेहद उपयोगी साबित होगा।
अभियान से जुड़े सदस्यों का कहना है कि आने वाले दिनों में राज्य और देश के विभिन्न हिस्सों में रह रहे प्रवासी उत्तराखंडियों तक पहुंचने के लिए व्यापक जनसंपर्क अभियान चलाया जाएगा। इसके तहत सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों और युवा संगठनों को भी जोड़ा जाएगा, ताकि वर्ष 2027 की जनगणना में अधिक से अधिक लोग अपने मूल गांव में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएं और उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के विकास को नई गति मिल सके।
राज्यसभा में गूंजा ‘अपनी गणना–अपना गांव’ अभियान
उत्तराखंड में चल रहे ‘अपनी गणना–अपना गांव’ अभियान की गूंज अब संसद तक पहुंच गई है। संसद के मानसून सत्र के दौरान राज्यसभा में उत्तराखंड से सांसद महेंद्र भट्ट ने पर्वतीय और सीमांत क्षेत्रों से हो रहे पलायन तथा आगामी जनगणना से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हुए केंद्र सरकार से विशेष नीति बनाने की मांग की।
राज्यसभा में चर्चा के दौरान महेंद्र भट्ट ने कहा कि उत्तराखंड देश का एक संवेदनशील सीमांत राज्य है और यहां के सीमावर्ती गांवों का खाली होना केवल विकास का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा भी है। उन्होंने कहा कि यदि सीमांत गांवों की वास्तविक जनसंख्या जनगणना में दर्ज नहीं हो पाती, तो भविष्य में इन क्षेत्रों के विकास और सुरक्षा दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
उन्होंने सदन से आग्रह किया कि पर्वतीय और सीमांत राज्यों की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विशेष जनगणना नीति तैयार की जाए। साथ ही जनगणना में अस्थायी पलायन और मूल निवास का अलग-अलग आंकड़ा दर्ज करने की व्यवस्था की जाए, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके और विकास योजनाएं उसी आधार पर बनाई जा सकें।
महेंद्र भट्ट ने यह भी सुझाव दिया कि जनगणना प्रक्रिया में ग्राम पंचायतों, स्थानीय निकायों और सामाजिक संगठनों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए। उनका कहना था कि स्थानीय स्तर पर लोगों की भागीदारी से जनगणना अधिक सटीक और प्रभावी होगी।
उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि उत्तराखंड में चल रहे ‘अपनी गणना–अपना गांव’ जैसे नवाचार को प्रोत्साहित किया जाए और भविष्य में इसे अन्य पर्वतीय राज्यों के लिए भी राष्ट्रीय मॉडल के रूप में विकसित किया जाए, ताकि पलायन की वास्तविक तस्वीर सामने आ सके और सीमांत क्षेत्रों के विकास एवं सुरक्षा को मजबूती मिल सके।
वर्ष 2025 में शुरू किए गए ‘अपनी गणना–अपना गांव’ अभियान को लोगों का उत्साहजनक समर्थन मिल रहा है। अभियान के तहत राज्य के विभिन्न क्षेत्रों और शहरों में लगातार बैठकें आयोजित कर लोगों को जनगणना के महत्व और अपने मूल गांव में पंजीकरण कराने के लिए जागरूक किया जा रहा है। आगामी चरण में अभियान को उत्तराखंड से बाहर रहने वाले प्रवासियों तक पहुंचाया जाएगा। इसके तहत देश के विभिन्न शहरों में बैठकें आयोजित कर उनसे अपील की जाएगी कि वे वर्ष 2027 की जनगणना अपने पैतृक गांव में जाकर कराएं, ताकि पर्वतीय क्षेत्रों की वास्तविक आबादी दर्ज हो सके और विकास योजनाओं का लाभ गांवों तक प्रभावी ढंग से पहुंच सके।
जोत सिंह बिष्ट, मुख्य संयोजक
यह केवल जनगणना का विषय नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत, गांवों की पहचान और पर्वतीय क्षेत्रों के भविष्य को सुरक्षित रखने का प्रयास है। आने वाले महीनों में राज्य के विभिन्न जनपदों के साथ-साथ देश के अन्य राज्यों में रहने वाले उत्तराखंड मूल के लोगों के बीच भी व्यापक जनसंपर्क अभियान चलाया जाएगा, ताकि अधिक से अधिक लोग अपनी जड़ों से जुड़ें और वर्ष 2027 की जनगणना में अपने गांव की जनसंख्या को मजबूत बनाने में भागीदारी निभाएं।
मथुरा दत्त जोशी,अभियान संयोजक
