- तारा दत्त गैरोला की अगुवाई में 1904 में कर्णप्रयाग में हुआ था सरोला समाज का पहला महाअधिवेशन
- परंपराओं के संरक्षण से हक की लड़ाई तक की भरी हुंकार
- सम्मेलन में 1400 साल पुरानी विरासत बचाने की दिखी चिंता
वाचस्पति रयाल @ देहरादून, रा. वि.।
देहरादून के मिलन गार्डन में रविवार को सरोला गढ़वाली ब्राह्मण समाज का भव्य मिलन समारोह आयोजित किया गया, जिसमें परंपराओं के संरक्षण, सामाजिक एकता और अपने अधिकारों को लेकर जागरूकता पर विशेष चर्चा हुई। सम्मेलन में समाज के लोगों ने अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के साथ-साथ वर्तमान समय में सामने आ रही चुनौतियों और अधिकारों के मुद्दों पर भी मंथन किया।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सुरेंद्र मैठाणी उपस्थित रहे, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में टिहरी के राजपरिवार से जुड़े भवानी प्रताप शाह ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। सरोला गढ़वाली ब्राह्मण संगठन के अध्यक्ष विजय थपलियाल, सचिव सुरेंद्र प्रसाद डिमरी, कोषाध्यक्ष नरेंद्र बिजल्वाण, सहायक कोषाध्यक्ष सत्य प्रसाद खंडूड़ी सहित समाज के अनेक वरिष्ठ सदस्य और गणमान्य लोग इस अवसर पर मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन जगदंबा प्रसाद डिमरी ने किया।
सम्मेलन की खास बात यह रही कि 121 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद सरोला गढ़वाली ब्राह्मण समाज का दूसरा बड़ा अधिवेशन आयोजित किया गया। इससे पहले वर्ष 1904 में समाज के विद्वान तारा दत्त गैरोला के प्रयासों से जनपद कर्णप्रयाग में समाज का पहला महाअधिवेशन आयोजित हुआ था।
देहरादून में आयोजित इस सम्मेलन में करीब साढ़े तीन सौ से अधिक सरोला ब्राह्मणों ने भाग लिया और अपनी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत बनाए रखने का संकल्प लिया।
बताया गया कि गढ़वाल क्षेत्र में सरोला गढ़वाली ब्राह्मणों का लगभग 1400 वर्षों पुराना गौरवशाली इतिहास रहा है। यह विशेष वर्ग प्राचीन परंपराओं के अनुसार प्रतिष्ठित पौराणिक मंदिरों के गर्भगृह में पूजा-अर्चना का कार्य करता रहा है। मंदिरों में भगवान को भोग तैयार करने की जिम्मेदारी भी परंपरागत रूप से सरोला ब्राह्मणों द्वारा निभाई जाती रही है।
इसी कारण सरोला ब्राह्मणों द्वारा तैयार भोजन को सभी वर्गों द्वारा सम्मानपूर्वक ग्रहण किया जाता है। विवाह, धार्मिक अनुष्ठान और सामूहिक दैवीय आयोजनों में भोजन तैयार करने की परंपरा भी इसी वर्ग के लोगों से जुड़ी रही है।
सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा कि समय के साथ बदलती सामाजिक परिस्थितियों के बीच इस पौराणिक परंपरा और पहचान को बनाए रखना समाज की बड़ी जिम्मेदारी है। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि यदि आने वाली पीढ़ियां अपनी परंपराओं से दूर होती गईं तो सदियों पुरानी यह विशिष्ट पहचान कमजोर पड़ सकती है।
समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि सरोला ब्राह्मण होना एक जन्मिक पहचान है, जिसमें माता और पिता दोनों का सरोला वर्ग से होना आवश्यक माना जाता है। इसी परंपरा से समाज की विशिष्ट श्रृंखला और सांस्कृतिक पहचान आगे बढ़ती रही है।
सम्मेलन में वक्ताओं ने एकजुटता पर जोर देते हुए कहा कि अपनी परंपराओं, अधिकारों और सामाजिक पहचान को सुरक्षित रखने के लिए संगठन को मजबूत करना होगा। जरूरत पड़ने पर समाज अपने हक और सम्मान की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन का रास्ता भी अपनाने से पीछे नहीं हटेगा।
इस अवसर पर सुशील नौटियाल, कुलदीप गैरोला, राजेंद्र मोहन नौटियाल, गणेश सेमेल्टी, विजय प्रकाश बिजल्वाण, उषा नौटियाल, शीला थपलियाल और विजय लक्ष्मी थपलियाल सहित बड़ी संख्या में समाज के लोग मौजूद रहे।
