- चढ़ावा विवाद के बहाने धामी सरकार के फैसले पर साधा निशाना
देहरादून@RashtriyVichar। बद्रीनाथ धाम में कथित चढ़ावा प्रकरण के बीच उत्तराखंड की सियासत में एक बार फिर चारधाम देवस्थानम बोर्ड का मुद्दा गरमा गया है। पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह आज भी अपने पुराने रुख पर कायम हैं। उनका कहना है कि यदि देवस्थानम बोर्ड अस्तित्व में होता, तो ऐसी कई समस्याओं का समय रहते समाधान हो जाता और व्यवस्थाओं पर अधिक प्रभावी नियंत्रण रहता।
त्रिवेंद्र रावत ने कहा कि देवस्थानम बोर्ड अपनी प्रशासनिक व्यवस्था के तहत मंदिरों से जुड़े मामलों का व्यवस्थित संचालन करता। बोर्ड के माध्यम से निगरानी, पारदर्शिता और जवाबदेही बेहतर होती, जिससे इस प्रकार के विवादों और अव्यवस्थाओं की नौबत नहीं आती।
गौरतलब है कि चारधाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड का गठन तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के कार्यकाल में किया गया था। उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम प्रबंधन विधेयक विधानसभा से पारित हुआ, राज्यपाल की स्वीकृति मिली और बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) की नियुक्ति भी कर दी गई थी। सरकार का दावा था कि बोर्ड के माध्यम से बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री समेत 51 मंदिरों का बेहतर प्रबंधन और श्रद्धालुओं के लिए आधुनिक सुविधाओं का विकास किया जाएगा।
हालांकि, तीर्थ पुरोहितों और हक-हकूकधारियों के तीव्र विरोध के चलते यह मुद्दा लगातार विवादों में रहा। वर्ष 2021 में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जनभावनाओं और विरोध को देखते हुए देवस्थानम बोर्ड को भंग करने की घोषणा कर दी। इस फैसले को त्रिवेंद्र सरकार के सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक को पलटने के रूप में देखा गया था।
अब बद्रीनाथ धाम में कथित चढ़ावा प्रकरण सामने आने के बाद त्रिवेंद्र रावत का बयान राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनके इस बयान को देवस्थानम बोर्ड की अवधारणा को एक बार फिर सही ठहराने और अप्रत्यक्ष रूप से धामी सरकार के उस फैसले पर सवाल उठाने के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे समय में जब चढ़ावा प्रकरण को लेकर प्रदेश की राजनीति और धार्मिक हलकों में बहस तेज है, यह बयान सियासी चर्चाओं को नई दिशा दे सकता है।
