A 35-year-old woman died during childbirth in Tharali, Chamoli district, highlighting gaps in maternal healthcare services in Uttarakhand’s hilly regions. The incident has raised serious concerns over lack of specialist doctors and emergency treatment facilities
- सुरक्षित मातृत्व के सरकारी हवा-हवाई
- अव्यवस्थाओं की कमी लगातार ले रही लोगों की जान
चमोली@Rashtriy Vichar।
सरकार पर्वतीय क्षेत्रों में बेहतर मातृ स्वास्थ्य सेवाएं, संस्थागत प्रसव और सुरक्षित मातृत्व के बड़े-बड़े दावे करती है। हर साल स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने, विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती और गर्भवती महिलाओं को समय पर उपचार उपलब्ध कराने के दावे किए जाते हैं। लेकिन चमोली जिले के थराली में हुई एक प्रसूता की दर्दनाक मौत ने इन दावों की परतें एक बार फिर उधेड़ दी हैं। यह केवल एक महिला की मौत नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जो पहाड़ की महिलाओं को सुरक्षित मातृत्व का भरोसा तो देती है, लेकिन जरूरत की घड़ी में उनके साथ खड़ी नजर नहीं आती।
थराली विकासखंड के कुराड़ गांव निवासी 35 वर्षीय सरिता देवी को सोमवार सुबह प्रसव पीड़ा होने पर परिजन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र थराली लेकर पहुंचे। परिवार की उम्मीद थी कि अस्पताल में सुरक्षित प्रसव होगा और कुछ घंटों बाद वे नवजात की किलकारियों के साथ सरिता को घर लेकर लौटेंगे। लेकिन किसे पता था कि अस्पताल की चौखट से शुरू हुआ यह सफर मातम में बदल जाएगा।
परिजनों का आरोप है कि सरिता करीब पांच घंटे तक अस्पताल में प्रसव पीड़ा से तड़पती रही। इस दौरान न तो विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध कराया गया और न ही समय रहते हायर सेंटर रेफर किया गया। जब स्थिति गंभीर होने लगी, तब अस्पताल प्रशासन ने गायनोकोलॉजिस्ट नहीं होने का हवाला देते हुए दोपहर बाद उन्हें 108 एंबुलेंस से कर्णप्रयाग भेज दिया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। नारायणबगड़ के पास रास्ते में ही सरिता की सांसें थम गईं। कर्णप्रयाग अस्पताल पहुंचने पर चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। परिजनों का कहना है कि मां के साथ गर्भस्थ शिशु भी नहीं बच सका। इस घटना ने पहाड़ की स्वास्थ्य व्यवस्था की उस सच्चाई को फिर सामने ला दिया है, जहां अस्पताल तो हैं, लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं। भवन बने हैं, लेकिन जरूरी संसाधनों का अभाव है। योजनाएं हैं, लेकिन समय पर उपचार नहीं। सबसे अधिक संकट तब सामने आता है, जब किसी गर्भवती महिला को आपात स्थिति में विशेषज्ञ इलाज की जरूरत पड़ती है।
सरिता देवी अपने पीछे पति नरेंद्र कुमार, 15 वर्षीय पुत्र नितिन और 8 वर्षीय पुत्री पायल को छोड़ गई हैं। मां की असमय मौत ने दोनों बच्चों के सिर से ममता का साया छीन लिया। परिवार में मातम पसरा है और गांव में गहरा आक्रोश है। उधर, प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉ. संजय गुप्ता ने स्वीकार किया कि अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं थे, इसलिए मरीज को हायर सेंटर रेफर किया गया। उन्होंने बताया कि पूरे मामले की जांच के आदेश दे दिए गए हैं और रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
दोषियों पर कार्रवाई की मांग
कुराड़ की ग्राम प्रधान चमेली देवी और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी अब लगातार लोगों की जान ले रही है और सरकार को इस दिशा में केवल घोषणाओं से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने होंगे।
108 एंबुलेंस में नही मिला ऑक्सीजन सिलेंडर
मृतका के भाई पप्पू सोलियाल ने आरोप लगाया कि सुबह अस्पताल पहुंचने के समय सरिता की हालत इतनी गंभीर नहीं थी कि उसे बचाया न जा सके। उनका कहना है कि यदि समय पर जांच होती और तुरंत रेफर किया जाता तो शायद उसकी जान बच सकती थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि 108 एंबुलेंस में ऑक्सीजन सिलेंडर और अन्य जरूरी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं थीं, जिससे रास्ते में हालत और बिगड़ती चली गई।
पहाड़ का अनुत्तरित सवाल
यह घटना केवल एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि पूरे पहाड़ का सवाल है। आखिर कब तक दूरदराज के ग्रामीण विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, विलंबित रेफरल और कमजोर आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की कीमत अपनी जान देकर चुकाते रहेंगे? यदि अस्पतालों में समय पर विशेषज्ञ चिकित्सक और आवश्यक संसाधन उपलब्ध नहीं कराए गए, तो सुरक्षित मातृत्व के सरकारी दावे कागजों तक ही सीमित रह जाएंगे।
