Tunnel Blasting Cracks Return in Baldiyakhan Homes, 14 Families Demand Relocation
- ग्रामीण बोले—टनल निर्माण का विरोध नहीं
- लेकिन जान की कीमत पर विकास मंजूर नहीं
वाचस्पति रयाल@ नरेंद्रनगर। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन के निर्माण के दौरान बल्दियाखान गांव के नीचे की जा रही टनल की हैवी ब्लास्टिंग का असर अब एक बार फिर ग्रामीणों के सामने गंभीर खतरे के रूप में दिखाई देने लगा है। करीब 14 परिवारों वाले इस गांव के मकानों में तीन वर्ष पहले पड़ी दरारों के बाद ग्रामीणों ने जोरदार आंदोलन किया था। उस समय ग्रामीणों ने स्पष्ट रूप से मांग उठाई थी कि उन्हें गांव के समीप सुरक्षित भूमि पर विस्थापित किया जाए, प्रत्येक प्रभावित परिवार के एक सदस्य को रोजगार दिया जाए और मकानों की वास्तविक क्षति के आकलन के आधार पर उचित मुआवजा दिया जाए।
आरवीएनएल मांगों को लेकर नहीं गंभीर: ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी तीन सूत्री मांगों पर गंभीरता से विचार करने के बजाय रेलवे विकास निगम की ओर से मकानों की मरम्मत के नाम पर मामूली धनराशि दी गई। ग्रामीणों के अनुसार यह राशि उनकी वास्तविक क्षति की तुलना में बेहद कम थी। उन्होंने अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को देखते हुए मरम्मत कार्य में अपनी जेब से भी बड़ी रकम खर्च की, ताकि मकानों को रहने लायक और सुरक्षित बनाया जा सके।
रिपेयरिंग के बावजूद भी कम नही हो रही दरारें: लेकिन अब ग्रामीणों की चिंता एक बार फिर बढ़ गई है। इस वर्ष क्षेत्र में अभी तक अपेक्षाकृत कम बारिश होने के बावजूद कई मकानों में दोबारा दरारें दिखाई देने लगी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब सामान्य परिस्थितियों में ही मरम्मत के बाद मकानों में फिर से दरारें पड़ रही हैं, तो भविष्य में जब रेलवे सेवा शुरू होगी और गांव के नीचे बनी टनल से रेलगाड़ियों का संचालन होगा, तब इन मकानों की स्थिति क्या होगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
सुरक्षा और जीवन से जुड़ा गंभीर सवाल: ग्रामीणों के मुताबिक मकानों की मौजूदा स्थिति अब महज संपत्ति के नुकसान का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह परिवारों की सुरक्षा और जीवन से जुड़ा गंभीर सवाल बन चुका है। उनका कहना है कि जिन मकानों को उन्होंने अपने और अपनी भावी पीढ़ी के सुरक्षित भविष्य के लिए बनाया था, वही अब खतरे का कारण बनते जा रहे हैं।
विकास चाहिए,मगर जान की कीमत पर नही: ग्रामीणों ने दो टूक कहा कि वे ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे परियोजना या विकास कार्य के विरोधी नहीं हैं। वे चाहते हैं कि क्षेत्र में विकास हो और रेलवे सुविधा का लाभ लोगों को मिले, लेकिन विकास की कीमत ग्रामीणों की जान और सुरक्षा से नहीं चुकाई जानी चाहिए। उनका कहना है कि यदि टनल निर्माण के दौरान हुए धमाकों से मकान जर्जर हुए हैं और भविष्य में इन मकानों में रहना खतरे से खाली नहीं है, तो सरकार, शासन-प्रशासन और रेलवे विकास निगम को इसका स्थायी समाधान तलाशना होगा।
खतरे के साये में जिंदगी: योजना से प्रभावित विमला देवी ने कहा कि मकान प्रत्येक व्यक्ति अपने और अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाता है। जब वही मकान जर्जर होकर परिवार के लिए खतरा बन जाए और किसी हादसे में लोगों के दबने की आशंका पैदा हो, तो ऐसे मकानों में रहना किसी भी परिवार के लिए संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार और संबंधित विभागों को ग्रामीणों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए ऐसा समाधान निकालना चाहिए, जिससे गांव के लोगों और उनकी आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित आवास मिल सके।
कई दौर की वार्ता के बाद भी नही निकला समाधान: ग्रामीणों का कहना है कि टनल निर्माण से मकानों में आई दरारों के बाद वे पिछले करीब चार वर्षों से लगातार अपनी तीन प्रमुख मांगों को लेकर शासन-प्रशासन, आरवीएनएल और संबंधित अधिकारियों के समक्ष आवाज उठा रहे हैं। इस दौरान ग्रामीणों और अधिकारियों के बीच कई दौर की वार्ताएं भी हो चुकी हैं, लेकिन ग्रामीणों के अनुसार उनकी मूल मांगों का अब तक स्थायी समाधान नहीं निकाला गया है।
दरारों की मरम्मत खतरे का समाधान नही: ग्रामीणों का आरोप है कि मरम्मत के लिए दी गई धनराशि समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। यदि मकानों की संरचनात्मक सुरक्षा ही सवालों के घेरे में है तो केवल दरारों की मरम्मत करके परिवारों को खतरे में नहीं छोड़ा जा सकता। उनका कहना है कि प्रभावित मकानों का दोबारा तकनीकी और निष्पक्ष आकलन कराया जाना चाहिए तथा वास्तविक स्थिति के आधार पर उचित मुआवजा और पुनर्वास की व्यवस्था की जानी चाहिए।
अब बड़े आंदोलन के मूड में ग्रामीण: ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि उनकी मांगों की लगातार अनदेखी की गई तो वे आंदोलन को और व्यापक रूप देने से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने कहा कि वे अपनी तीन सूत्री मांगों समीपवर्ती सुरक्षित भूमि पर विस्थापन, प्रत्येक प्रभावित परिवार के एक सदस्य को रोजगार और मकानों के वास्तविक नुकसान के आधार पर उचित मुआवजा—को लेकर किसी भी हद तक संघर्ष करने के लिए तैयार हैं।
पीढ़ियों सुरक्षा का मामला: ग्रामीणों का कहना है कि मामला केवल वर्तमान 14 परिवारों का नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा से भी जुड़ा है। इसलिए प्रशासन और रेलवे विकास निगम को समय रहते ठोस निर्णय लेना होगा, ताकि किसी संभावित हादसे के बाद जिम्मेदारी तय करने की नौबत न आए।
बैठक में विमला देवी, मदन रयाल, मनोज प्रसाद, कीर्ति राम, प्रधान लोड़सी बृजेश कुमार, सत्ये सिंह, वासुदेव, राकेश रयाल, राजेंद्र प्रसाद, राधेलाल, कमलदीप, कविता देवी, शाकंभरी देवी और धनवीर सहित कई ग्रामीण मौजूद रहे।
