- सातों-आठों में शिव-पार्वती की आराधना का पर्व
- लोकगीतों में झलकी कुमाऊं की संस्कृति
- आस्था, रिश्तों और लोकपरंपरा का अद्भुत संगम
नदीम परवेेज@ धारचूला। कुमाऊं अंचल में मनाया जाने वाला सातों-आठों गौरा पर्व आस्था, पारिवारिक मंगल और लोकसंस्कृति का अनूठा पर्व है। भाद्रपद मास में मनाए जाने वाले इस पर्व में भगवान शिव और माता गौरा यानी पार्वती की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि गौरा पर्व दांपत्य सुख, परिवार की खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक है।
भगवान शिव और माता गौरा की होती है पूजा
गौरा पर्व में माता गौरा (पार्वती) और भगवान महेश्वर (शिव) की पूजा की जाती है। कुमाऊं की लोकपरंपरा में गौरा को एक बेटी और सुहागिन स्त्री के रूप में भी देखा जाता है। महिलाएं अपने परिवार की सुख-शांति, पति की दीर्घायु और संतान के मंगल की कामना के साथ पूजा-अर्चना करती हैं।
सातों और आठों का क्या है महत्व?
पर्व के सातों दिन गौरा की स्थापना और पूजा से जुड़ी परंपराएं निभाई जाती हैं, जबकि आठों के दिन पर्व अपने विशेष रूप में मनाया जाता है। गांवों में महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में एकत्र होकर गौरा-महेश्वर की पूजा करती हैं और लोकगीत गाती हैं।
कई स्थानों पर गौरा और महेश्वर की प्रतिमाओं या प्रतीकात्मक रूपों को सजाकर सामूहिक पूजा की जाती है। इसके बाद लोकगीत, झोड़ा, चांचरी और अन्य पारंपरिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से पर्व की खुशियां साझा की जाती हैं।
लोकजीवन से गहराई से जुड़ा पर्व
सातों-आठों केवल पूजा-पाठ तक सीमित पर्व नहीं है। यह कुमाऊं की सामाजिक एकता, पारिवारिक रिश्तों और लोक परंपराओं को जीवित रखने वाला महत्वपूर्ण अवसर है। इस दौरान विवाहित बेटियों को मायके बुलाने और उन्हें सम्मानपूर्वक पर्व में शामिल करने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में देखने को मिलती है।
गांवों में आज भी बुजुर्ग महिलाएं नई पीढ़ी को गौरा पर्व से जुड़ी कथाएं, गीत और रीति-रिवाज सिखाती हैं। यही वजह है कि बदलते समय के बावजूद सातों-आठों पर्व कुमाऊं की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।
आस्था के साथ संस्कृति का उत्सव
सातों-आठों गौरा पर्व में शिव-पार्वती के प्रति आस्था के साथ कुमाऊं की समृद्ध लोकसंस्कृति की झलक देखने को मिलती है। ढोल-दमाऊं की थाप, पारंपरिक गीत और सामूहिक पूजा पूरे माहौल को उत्सवमय बना देते हैं। सातों-आठों गौरा पर्व का संदेश यही है कि आस्था के साथ अपनी लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को भी अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।
