Doon Library Digitises Rare Uttarakhand Folk Music Records and Narendra Singh Negi’s ‘Gyan Ganga’ Cassette
- दून लाइब्रेरी ने संजोई लोकसंगीत की अनमोल विरासत
- नरेंद्र नेगी की दुर्लभ कैसेट डिजिटाइज
- कुमाऊंनी लोकगीतों के छह दुर्लभ ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स को भी मिला डिजिटल स्वरूप
देहरादून@RASHTRIY VICHAR।
उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और लोकसंगीत की अनमोल विरासत को संरक्षित करने की दिशा में दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। केंद्र ने उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध लोकगायक एवं ‘गढ़ रत्न’ नरेंद्र सिंह नेगी की वर्ष 1992-93 में तैयार की गई एक दुर्लभ ऑडियो कैसेट को डिजिटल रूप में संरक्षित किया है। ‘ज्ञान गंगा’ नाम की इस रिकॉर्डिंग में कुल नौ लोकगीत शामिल हैं।
यह दुर्लभ ऑडियो रिकॉर्डिंग चमोली के शिक्षा विभाग की ओर से तैयार कराई गई थी। समय के साथ यह कैसेट नरेंद्र सिंह नेगी के निजी संग्रह से भी गायब हो गई थी। बाद में इसे चमोली में खोजकर सोशल एक्टिविस्ट हरपाल नेगी ने अपने निजी संग्रह में सुरक्षित रखा। दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर के अनुरोध पर हरपाल नेगी ने यह दुर्लभ रिकॉर्डिंग उपलब्ध कराई, जिसके बाद गुरुवार को इसे डिजिटल स्वरूप प्रदान किया गया।
दून लाइब्रेरी की ओर से लोकसंगीत की दुर्लभ धरोहर को संरक्षित करने के तहत कुमाऊंनी ग्रामोफोन के छह दुर्लभ रिकॉर्ड और नरेंद्र सिंह नेगी की इस ऐतिहासिक कैसेट को डिजिटल करने की पहल की गई। केंद्र ने लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी से भी अनुरोध किया है कि वे इन गीतों को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से लोगों तक पहुंचाएं, ताकि यह अमूल्य लोकसंगीत विरासत लंबे समय तक सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रह सके। दरअसल दुर्लभ रिकॉर्डिंग्स का डिजिटल संरक्षण न केवल पुरानी आवाजों और गीतों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का माध्यम है, बल्कि उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति को सुरक्षित रखने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम भी है।
90 साल पुरानी कुमाऊंनी लोकधुनों को मिली डिजिटल जिंदगी
खास प्रोजेक्ट के तहत केंद्र ने गुरुवार को देहरादून में कुमाऊंनी लोकगीतों के छह दुर्लभ ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स को डिजिटल स्वरूप प्रदान किया।
बताया जा रहा है कि ये ऐतिहासिक ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स 1930 के दशक के अंतिम वर्षों या 1940 के दशक की शुरुआत के हो सकते हैं। इन रिकॉर्ड्स के बारे में अब तक बेहद कम लोगों को जानकारी थी। लंबे समय तक निजी संग्रह का हिस्सा रहे इन रिकॉर्ड्स का मिलना उत्तराखंड की लोकसंगीत परंपरा के लिए महत्वपूर्ण खोज माना जा रहा है।
ये दुर्लभ रिकॉर्ड्स देहरादून में ब्रिगेडियर राजेंद्र रावत के निजी संग्रह में सुरक्षित मिले। रिकॉर्ड्स की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को देखते हुए दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र ने इन्हें डिजिटल रूप में संरक्षित करने की पहल की, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी करीब एक सदी पुरानी कुमाऊंनी लोकधुनों को सुन और समझ सकें।
लोकसंगीत की ये पुरानी रिकॉर्डिंग्स उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। डिजिटलीकरण के जरिए अब इन दुर्लभ धुनों के समय के साथ खो जाने का खतरा कम हो गया है। यह पहल न केवल पुराने संगीत को संरक्षित करने की दिशा में अहम कदम है, बल्कि उत्तराखंड की लोक परंपराओं और सांस्कृतिक इतिहास को नई पीढ़ी से जोड़ने का भी माध्यम बनेगी।
कई दिग्गज कलाकारों की आवाज से सजी थी ‘ज्ञान गंगा’
‘ज्ञान गंगा’ में नरेंद्र सिंह नेगी के अलावा अनुराधा निराला, मीना राणा, उमा राणा, विदोत्तम सहित अन्य कलाकारों की आवाजें भी शामिल हैं। इन गीतों को भजन सिंह कंडारी, शशि भूषण मैथाणी, कृष्णानंद नौटियाल, हरपाल नेगी, महिपाल स्नेही, पुष्कर कंडारी और सुदर्शन भंडारी ने लिखा था। ऐसे में यह रिकॉर्डिंग उत्तराखंड के लोकसंगीत के एक महत्वपूर्ण दौर और उसकी रचनात्मक विरासत का दस्तावेज भी मानी जा रही है।
रिस्की पाठक ने भी निभाई अहम भूमिका
इस संरक्षण कार्य में हल्द्वानी के रिस्की पाठक का भी विशेष सहयोग रहा। उन्होंने दून लाइब्रेरी में इन दुर्लभ रिकॉर्डिंग्स के डिजिटलीकरण के कार्य में सहयोग किया। उल्लेखनीय है कि रिस्की पाठक अपने स्तर पर उत्तराखंड के दुर्लभ एवं पारंपरिक गीत-संगीत को विभिन्न स्थानों से खोजकर एकत्रित करने और संरक्षित करने का कार्य कर रहे हैं। उनका प्रयास है कि इस सांस्कृतिक विरासत को ‘कुमाऊंनी आर्काइव’ वेबसाइट के माध्यम से आम नागरिकों को निःशुल्क उपलब्ध कराया जा सके।
इस अवसर पर गढ़ रत्न नरेंद्र सिंह नेगी, डॉ. नंद किशोर हटवाल, वरिष्ठ पत्रकार राजू गुसाईं, दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के कार्यक्रम अधिकारी चंद्रशेखर तिवारी, डॉ. लालता प्रसाद, सुंदर सिंह बिष्ट सहित अनेक लोकसंगीत प्रेमी मौजूद रहे।
