- पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई शुरू की और नाम कटौती, विसंगतियों तथा राज्यों में असमान क्रियान्वयन पर सवाल उठाए।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई शुरू की, जिसमें चुनाव आयोग द्वारा किए जा रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन—SIR) को चुनौती दी गई है। तृणमूल कांग्रेस सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने बताया कि सुनवाई के दौरान अदालत ने “दो महत्वपूर्ण बिंदुओं” पर ध्यान दिया और मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी के लिए तय की है।
कल्याण बनर्जी के अनुसार, ममता बनर्जी ने अदालत के समक्ष दलील दी कि पुनरीक्षण प्रक्रिया में नए मतदाताओं के नाम जोड़ने के बजाय केवल नाम काटने पर जोर दिया जा रहा है, जबकि पिछले लगभग चार महीनों से नाम जोड़ने की प्रक्रिया ठप पड़ी है। उन्होंने माइक्रो-ऑब्जर्वरों की नियुक्ति पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि कानून में ऐसे पद की कोई व्यवस्था नहीं है और आरोप लगाया कि इनमें से कई को भाजपा-शासित राज्यों से लाया गया है।
महत्वपूर्ण रूप से, ममता बनर्जी ने यह भी कहा कि SIR की प्रक्रिया गैर-भाजपा शासित राज्यों में जल्दबाजी में लागू की जा रही है, जबकि कई भाजपा-शासित राज्यों में यह प्रक्रिया अब तक शुरू ही नहीं हुई है। उन्होंने इसे चुनावी प्रक्रिया में समानता और निष्पक्षता के सिद्धांत के खिलाफ बताया।
मुख्यमंत्री ने मतदाता सूची में कथित त्रुटियों का भी जिक्र किया, जिनमें नामों की गलत वर्तनी शामिल है। उदाहरण देते हुए कहा गया कि ‘खान’ को ‘खा’ छापा गया। इस पर अदालत ने भी ‘दत्ता’ और ‘दुत्ता’, तथा ‘बिपूल’ और ‘बिपुल’ जैसे उदाहरणों का उल्लेख किया।
ममता बनर्जी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने अदालत को बताया कि करीब 32 लाख मतदाता अब भी अनमैप्ड हैं, 1.36 करोड़ नाम “तार्किक विसंगतियों” की सूची में हैं और लगभग 63 लाख मामलों में सुनवाई लंबित है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि आधार, निवास प्रमाण पत्र और ओबीसी प्रमाण पत्र जैसे वैध दस्तावेजों को स्वीकार नहीं किया जा रहा है।
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने कहा कि वास्तविक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में बने रहने चाहिए और किसी भी निर्दोष व्यक्ति को बाहर नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को नोटिस जारी करते हुए समयसीमा बढ़ाने की आवश्यकता पर भी संकेत दिया।
