- हाईकमान का भरोसा जीतने में कामयाब रहे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी
देहरादून@ रा.वि। उत्तराखंड में सियासत एक बार फिर गर्म है। आगामी 23 मार्च को पुष्कर सिंह धामी सरकार के चार वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। इन चार वर्षों को भारतीय जनता पार्टी उपलब्धियों के उत्सव के रूप में मनाने की तैयारी में है। पार्टी इसे “जनसेवा और विकास के चार साल” के रूप में प्रस्तुत करने जा रही है। कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी के शामिल होने की संभावना भी जताई जा रही है, जिससे इस आयोजन को राष्ट्रीय महत्व देने की रणनीति साफ दिखाई देती है।
धामी को लंबे समय से प्रधानमंत्री का भरोसेमंद मुख्यमंत्री माना जाता रहा है। उनके कार्यकाल में प्रधानमंत्री का उत्तराखंड दौरा कई बार हुआ, जिसे राजनीतिक तौर पर धामी की केंद्रीय नेतृत्व से नजदीकी के रूप में देखा गया। यही कारण है कि पार्टी के भीतर समय-समय पर उठे असंतोष और नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों के बावजूद हाईकमान का संरक्षण उनकी कुर्सी को मजबूती देता रहा।
चार साल की उपलब्धियों की बात करें तो सरकार नकल विरोधी कानून, समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में पहल, युवाओं को सरकारी नौकरियों में अवसर, निवेश और औद्योगिक विकास जैसे मुद्दों को प्रमुखता से सामने रखेगी। भाजपा इन फैसलों को निर्णायक नेतृत्व और मजबूत प्रशासन का प्रमाण बताने की तैयारी में है।
लेकिन राजनीतिक तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति, खाली होते स्कूल, जर्जर विद्यालय भवन, पलायन, गांवों को जोड़ने वाले संपर्क मार्गों की कमी और जंगली जानवरों के हमलों से जूझती ग्रामीण आबादी जैसे मुद्दे विपक्ष और सामाजिक संगठनों के निशाने पर हैं। देहरादून में बढ़ती आपराधिक घटनाएं, अवैध खनन और कानून व्यवस्था पर उठते सवाल भी सरकार के लिए चुनौती बने हुए हैं।
पार्टी के भीतर भी धड़ेबाजी और असंतोष के स्वर समय-समय पर सामने आते रहे। कुछ नेताओं द्वारा नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें तेज हुईं, विधायकों के दिल्ली दरबार के चक्कर भी चर्चा में रहे। हालांकि हर बार केंद्रीय नेतृत्व ने हस्तक्षेप कर स्थिति को शांत किया और यह संकेत दिया कि 2027 विधानसभा चुनाव तक नेतृत्व परिवर्तन की संभावना नहीं है।
अब जब 2027 की आहट सुनाई देने लगी है, तो यह जश्न केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं बल्कि राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन भी माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की रणनीति में जो दिखता है, वह अंतिम तस्वीर नहीं होती। चार साल का जश्न दरअसल 2027 के चुनावी अभियान की औपचारिक शुरुआत का मंच भी बन सकता है।
प्रदेश की जनता धामी सरकार के कामकाज को किस नजरिए से देखती है, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा। सवाल यही है कि क्या विकास का मॉडल पर्वतीय और मैदानी संतुलन के अनुरूप खरा उतर पाया है, या फिर यह जश्न राजनीतिक संदेश ज्यादा और जनभावनाओं का प्रतिबिंब कम है।
