- कैबिनेट विस्तार की आस टूटी, विधायकों में उबाल , भाजपा के भीतर बढ़ता असंतोष, चुनावी खतरे की आहट
देहरादून। उत्तराखंड में जैसे-जैसे समय आगे बढ़ रहा है, कैबिनेट विस्तार को लेकर विधायकों की उम्मीदें अब धुंधली ही नहीं, लगभग टूटती हुई दिखाई देने लगी हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव अब दूर नहीं हैं, फरवरी का महीना बीत रहा है, जबकि पिछला विधानसभा चुनाव 14 फरवरी 2022 को हुआ था। यानी चुनावी अधिसूचना में अब गिने-चुने महीने ही शेष हैं। ऐसे में सत्ता पक्ष के भीतर सब्र का बांध टूटना स्वाभाविक माना जा रहा है।
हाल ही में एक विधायक से जब मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर सवाल किया गया, तो जवाब में उम्मीद नहीं, बल्कि गहरी मायूसी झलकती दिखी। विधायक का साफ कहना था—
इन सात-आठ महीनों में अगर विस्तार हुआ भी तो क्या हो जाएगा?
यह एक वाक्य ही सत्ता दल के भीतर पनप रही निराशा और असंतोष की पूरी तस्वीर बयान कर देता है।
असल सवाल यह है कि कैबिनेट में पांच पद रिक्त होने के बावजूद अब तक उन्हें भरा क्यों नहीं गया? यह मुद्दा अब सिर्फ राजनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं, बल्कि प्रदेश की सियासत का बड़ा विषय बन चुका है। चर्चा आम है कि भाजपा हाईकमान कभी भी गंभीरता से कैबिनेट विस्तार के पक्ष में नहीं रहा, जबकि विधायक लगातार उम्मीद लगाए बैठे रहे।
इसका सीधा असर अब संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर दिखने लगा है।
संगठन के भीतर भी दबी जुबान से यह स्वीकार किया जा रहा है कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। असंतोष खुलकर भले सामने न आए, लेकिन अंदरखाने खलबली तेज होती जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह असंतुलन और उपेक्षा की भावना अगर समय रहते नहीं संभाली गई, तो इसका प्रभाव सीधे आगामी विधानसभा चुनाव 2027 पर पड़ सकता है।
खाली पद सिर्फ कुर्सियाँ नहीं हैं, बल्कि वे आकांक्षाओं, संतुलन और संगठनात्मक सामंजस्य का प्रतीक होते हैं और जब ये खाली रहते हैं, तो राजनीति में खालीपन नहीं, बल्कि असंतोष भर जाता है।
उत्तराखंड की राजनीति में अब सवाल सिर्फ कैबिनेट विस्तार का नहीं, बल्कि यह बनता जा रहा है,
क्या सत्ता के भीतर पनप रहा यह असंतोष आने वाले चुनावों में बड़ा सियासी संकट बनेगा?
