- विधानसभा चुनाव 2027 की छाया में कैबिनेट विस्तार का संकट
- हाईकमान की मंजूरी में उलझा कैबिनेट विस्तार
- 2027 चुनाव से पहले विधायकों में बढ़ता असंतोष
देहरादून @राष्ट्रीय विचार। उत्तराखंड की राजनीति में लंबे समय से चर्चा में रहा धामी कैबिनेट विस्तार अब सवालों के घेरे में आता जा रहा है। समय बीतने के साथ चर्चाएं धुंधली नहीं, बल्कि और ज्यादा राजनीतिक दबाव में बदलती नजर आ रही हैं। कैबिनेट मंत्री बनने की उम्मीद लगाए बैठे विधायकों का सब्र अब जवाब देने लगा है और अंदरखाने असंतोष खुलकर महसूस किया जा रहा है।
वर्तमान में धामी मंत्रिमंडल में 5 कैबिनेट सीटें खाली पड़ी हुई हैं। जब वर्ष 2022 में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ था, तभी से 3 पद रिक्त चले आ रहे थे। इसके बाद 2023 में कैबिनेट मंत्री चंदन रामदास के निधन और 16 मार्च 2025 को कैबिनेट मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल के इस्तीफे से दो और पद खाली हो गए। इस तरह लगातार घटनाक्रमों के बावजूद अब तक रिक्त पदों को नहीं भरा जाना राजनीतिक असंतुलन की स्थिति पैदा कर रहा है।
संवैधानिक रूप से 12 कैबिनेट पदों के सापेक्ष वर्तमान में मुख्यमंत्री सहित केवल 6 मंत्री ही मंत्रिमंडल में शामिल हैं। इनमें सतपाल महाराज, गणेश जोशी, सुबोध उनियाल, सौरभ बहुगुणा, धन सिंह रावत और रेखा आर्या शामिल हैं। शेष पदों को लेकर समय-समय पर चर्चाएं जरूर सामने आती रही हैं, लेकिन किसी ठोस निर्णय का अभाव बना हुआ है।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि हाईकमान से ग्रीन सिग्नल न मिलने के कारण मुख्यमंत्री धामी खुद भी निर्णय की स्थिति में नहीं दिख रहे हैं। इससे संगठन और सरकार के बीच संतुलन का सवाल भी खड़ा हो रहा है। 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए यह स्थिति और अधिक संवेदनशील हो गई है, क्योंकि लंबे समय तक कैबिनेट विस्तार न होना सीधे तौर पर क्षेत्रीय संतुलन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक मनोबल को प्रभावित कर रहा है।
विधायकों में यह भावना गहराती जा रही है कि सरकार का चेहरा होने के बावजूद उन्हें निर्णय प्रक्रिया में स्थान नहीं मिल पा रहा है, जिससे आने वाले चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि समय रहते कैबिनेट विस्तार नहीं हुआ, तो यह असंतोष 2027 के चुनाव में संगठनात्मक कमजोरी का कारण बन सकता है।
अब सवाल यह नहीं है कि कैबिनेट विस्तार होगा या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि
क्या 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह राजनीतिक संतुलन साधा जा सकेगा या यह असंतोष चुनावी रणनीति को ही कमजोर कर देगा?
