Government schools in India face growing concerns over education quality, basic facilities, teacher accountability and the changing state of public education.
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लेखक: रामभरोसे मीणा
आजादी के बाद से बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और सर्वांगीण विकास को लेकर सरकारों ने लगातार योजनाएं और अभियान चलाए। बच्चों को राष्ट्र का भविष्य मानते हुए शिक्षा को अधिकार और प्राथमिकता देने के प्रयास हुए। विद्यालयों का विस्तार किया गया, निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की गई और ड्रॉप आउट बच्चों को दोबारा स्कूल से जोड़ने पर जोर दिया गया। इन प्रयासों का असर भी दिखा। समाज के हर वर्ग के बच्चे एक साथ पढ़ने लगे और शिक्षा सामाजिक बदलाव का मजबूत माध्यम बनी।
लेकिन वर्तमान समय में सरकारी विद्यालयों की स्थिति कई सवाल खड़े कर रही है। पिछले डेढ़ दशक में निजी विद्यालयों को बढ़ावा मिलने के साथ सरकारी स्कूलों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि बड़ी संख्या में अभिभावक अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में भेजने के लिए आर्थिक दबाव तक उठाने लगे। दूसरी ओर कई ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार आज भी सरकारी विद्यालयों पर निर्भर हैं, लेकिन उन्हें वहां अपेक्षित गुणवत्ता और सुविधाएं मिलना चुनौती बना हुआ है।
सबसे बड़ा सवाल शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षक की जवाबदेही को लेकर है। कई विद्यालयों में संसाधनों की कमी, सीमित कक्ष, शौचालय और अन्य बुनियादी सुविधाओं की समस्या बनी हुई है। कहीं विद्यार्थियों की संख्या के अनुपात में शिक्षक पर्याप्त नहीं हैं तो कहीं पर्याप्त मानव संसाधन होने के बावजूद शैक्षिक परिणाम अपेक्षानुरूप नहीं हैं। केवल पुस्तकीय ज्ञान तक शिक्षा को सीमित कर देना बच्चों के सामाजिक, व्यवहारिक और बौद्धिक विकास के उद्देश्य को कमजोर करता है।
तकनीक के बढ़ते प्रभाव के दौर में विद्यालयों में मोबाइल फोन के उपयोग और शिक्षण व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। शिक्षक और विद्यार्थी दोनों के लिए तकनीक उपयोगी हो सकती है, लेकिन उसका इस्तेमाल शिक्षा के उद्देश्य को मजबूत करने के बजाय मनोरंजन या गैर-शैक्षणिक गतिविधियों तक सीमित हो जाए तो यह चिंता का विषय है।
दूसरी ओर विद्यालयों में अभिभावकों की भूमिका भी सीमित होती जा रही है। सुरक्षा और प्रशासनिक नियमों के कारण अभिभावकों का विद्यालय परिसर में प्रवेश, कक्षाओं का निरीक्षण अथवा व्यवस्थाओं को प्रत्यक्ष देखने की प्रक्रिया कठिन हुई है। पारदर्शिता और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना जरूरी है, ताकि अभिभावकों की शिकायतों और सुझावों के लिए प्रभावी व्यवस्था मौजूद रहे।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, प्रशासन, शिक्षक, अभिभावक और समाज सभी मिलकर सरकारी शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति पर गंभीरता से विचार करें। विद्यालयों में पर्याप्त कक्ष, स्वच्छ शौचालय, सुरक्षित वातावरण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षण और बच्चों के सर्वांगीण विकास की व्यवस्था सुनिश्चित होनी चाहिए। शिक्षकों को भी अपने दायित्व को केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित न रखते हुए बच्चों के संस्कार, व्यवहार और सामाजिक विकास पर ध्यान देना होगा।
सरकारी विद्यालयों में सुधार केवल भवन और योजनाओं से संभव नहीं होगा। इसके लिए जवाबदेही, पारदर्शिता और शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता जरूरी है। यदि समय रहते व्यवस्था की कमियों को दूर किया गया और बच्चों के भविष्य को केंद्र में रखकर काम हुआ, तो सरकारी विद्यालयों में फिर से अभिभावकों का भरोसा लौट सकता है। यही शिक्षा व्यवस्था और शिक्षक के सम्मान, दोनों को बचाने की दिशा में सबसे जरूरी कदम होगा।
