Traditional Lai Festival celebrated in Himalayan bugyals as shepherds perform wool shearing rituals, preserve pastoral traditions and strengthen their bond with nature.
- लाई त्योहार में दिखी हिमालयी पशुपालक संस्कृति की झलक
- दीपावली तक बुग्यालों में रहेगा प्रवास
ऊखीमठ @Rashtriya Vichar#UK Heven। हिमालय के सुरम्य और मखमली बुग्यालों में भेड़ पालक समुदाय का पारंपरिक लाई त्योहार इस बार भी धूमधाम और उल्लास के साथ मनाया गया। भाद्रपद माह की पांच गते मनाया जाने वाला यह पर्व महज ऊन छंटाई की परंपरा नहीं, बल्कि सदियों पुरानी पशुपालक संस्कृति, सामूहिक जीवन और प्रकृति के साथ गहरे रिश्ते का प्रतीक है। रंग-बिरंगे फूलों और हरियाली से सजे बुग्यालों में दिनभर चहल-पहल रही।
उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पहुंचे भेड़ पालकों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ अपनी भेड़-बकरियों की ऊन छांटी। पशुपालकों के अनुसार बदलते मौसम के बीच पशुओं के स्वास्थ्य और देखभाल के लिहाज से भी ऊन छंटाई की यह परंपरा महत्वपूर्ण मानी जाती है।
भेड़ पालक प्रेम भट्ट ने बताया कि लाई पर्व सामूहिक मेल-मिलाप का अवसर भी है। बुग्यालों में एकत्र होकर पशुपालक एक-दूसरे से मिलते हैं और नई पीढ़ी को पशुपालन से जुड़ी पारंपरिक जानकारी देते हैं।
लाई पर्व के बाद पशुपालक अपने पशुधन के साथ और ऊंचाई वाले बुग्यालों की ओर रुख करेंगे। कई महीनों तक हिमालयी क्षेत्रों में प्रवास के बाद दीपावली के आसपास वे गांव लौटेंगे। ग्रामीणों का कहना है कि बदलते दौर में पशुपालन के तौर-तरीके भले बदले हों, लेकिन लाई पर्व आज भी उनकी जड़ों और लोक संस्कृति को जीवंत रखे हुए है। पशुपालकों ने बुग्यालों के संरक्षण के साथ इस अनूठी परंपरा को बचाए रखने पर भी जोर दिया।
ऊन छंटाई की परम्परा से जुड़ा है पर्व
लाई त्योहार भेड़ पालकों के लिए विशेष महत्व रखता है। वर्षभर भेड़-बकरियों के पालन-पोषण में जुटे पशुपालक इस अवसर पर अपनी भेड़-बकरियों की ऊन की छंटाई करते हैं। ऊन की छंटाई के बाद पशुओं को व्यवस्थित कर उनकी देखभाल की जाती है। माना जाता है कि बदलते मौसम के अनुरूप पशुओं के स्वास्थ्य और उनकी देखभाल की दृष्टि से भी यह परम्परा महत्वपूर्ण रही है।
भेड़ पालक प्रेम भट्ट के अनुसार लाई त्योहार केवल ऊन छंटाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनके सामूहिक जीवन, लोक परम्पराओं और आपसी मेल-मिलाप का पर्व भी है। बुग्यालों में एकत्र होकर भेड़ पालक एक-दूसरे से मिलते हैं और अपनी पुरानी परम्पराओं को आगे बढ़ाते हैं। नई पीढ़ी भी इस अवसर पर बुजुर्गों से पशुपालन से जुड़ी पारम्परिक जानकारियां हासिल करती है।
दीपावली पर लौटेंगे अपने-अपने गांव
लाई त्योहार के बाद भेड़ पालकों का अगला पड़ाव ऊंचाई वाले क्षेत्र होंगे। कई माह तक बुग्यालों और ऊंचाई वाले इलाकों में प्रवास करने के बाद भेड़ पालक दीपावली के आसपास अपने गांवों में वापस लौटते हैं। इस प्रकार लाई से लेकर दीपावली तक का समय उनके लिए पशुधन के साथ हिमालयी बुग्यालों में प्रवास का महत्वपूर्ण दौर होता है।
आधुनिक दौर में पशुपालन के तौर-तरीकों में बदलाव के बावजूद लाई त्योहार जैसी परम्पराएं आज भी ग्रामीण संस्कृति को जीवंत बनाए हुए हैं। यह पर्व आने वाली पीढ़ियों को अपनी लोक परम्पराओं, पारम्परिक पशुपालन और प्रकृति से जुड़ाव की विरासत से परिचित कराने का माध्यम भी बन रहा है।
