Selfishness at Its Peak: Cattle Abandoned in Forests After They Stop Being Useful
- गाय-बैल को जंगल में छोड़ना बंद हो: देवेंद्र भट्ट
- बेजुबानों की दुर्दशा पर उठी सख्त कार्रवाई की मांग
रुद्रप्रयाग@Rashtriy Vichar। पर्वतीय क्षेत्रों में इंसान और पशुओं के बीच रिश्ते को लेकर एक संवेदनशील तस्वीर सामने आई है। जिन गाय-बैलों ने वर्षों तक परिवारों का साथ दिया, वही उम्रदराज या काम के लायक न रहने पर जंगलों में बंधे हुए जंगली जानवरों का निवाला बनने के लिए छोड़ दिए जा रहे हैं। यह स्थिति न केवल पशुओं की पीड़ा दिखाती है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
तल्लानागपुर क्षेत्र की ग्राम पंचायत मयकोटी के प्रधान एवं समाजसेवी देवेंद्र भट्ट ने इस पीड़ा को सामने लाने के लिए वीडियो जारी किया है। उन्होंने पालतू पशुओं को जंगलों में लावारिस छोड़ने की प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए इसे इंसान के बढ़ते स्वार्थ की पराकाष्ठा बताया।

भट्ट ने कहा कि जब तक गाय और बैल परिवारों के लिए दूध, खेती और अन्य जरूरतों के जरिए आर्थिक सहारा बने रहते हैं, तब तक उनकी देखभाल की जाती है। लेकिन उम्र बढ़ने या उपयोगिता खत्म होने के बाद कई पशुओं को जंगलों में ले जाकर पेड़ों से बांध दिया जाता है। वहां वे भूख-प्यास और जंगली जानवरों के खतरे के बीच दम तोड़ने को मजबूर होते हैं।
उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में गाय को सम्मानजनक स्थान दिया गया है, लेकिन व्यवहार में उसी पशु के साथ ऐसी बेरहमी बेहद पीड़ादायक है। यह केवल पशु क्रूरता का मामला नहीं, बल्कि समाज की संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की भी परीक्षा है।
देवेंद्र भट्ट ने सरकार और प्रशासन से पशुओं को जंगलों में छोड़ने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए जनजागरूकता अभियान चलाने तथा दोषियों के खिलाफ कठोर दंड और जुर्माने का प्रावधान करने की मांग की। उन्होंने कहा कि विकास और आधुनिकता के बीच मानवीय संवेदनाएं खत्म नहीं होनी चाहिए। बेजुबान पशुओं की रक्षा समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
