- बजट 2026-27 का खाका तय करेगा उत्तराखंड की दिशा-दशा
- धामी सरकार पर टिकीं सीमांत क्षेत्रों की उम्मीदें
- चार साल के कार्यकाल के बाद बड़ा सियासी इम्तिहान
देहरादून@रावि। ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण में प्रस्तावित बजट सत्र को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। वर्ष 2026-27 के बजट को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं और इसे केवल वित्तीय दस्तावेज नहीं, बल्कि आगामी राजनीतिक दिशा तय करने वाले निर्णायक क्षण के रूप में देखा जा रहा है। पुष्कर सिंह धामी देहरादून से बजट का पिटारा लेकर पहाड़ की ओर रुख करने वाले हैं, लेकिन इस बार गैरसैंण का यह सत्र महज औपचारिकता नहीं, बल्कि 2027 के चुनावी समीकरणों का मंच भी बनता नजर आ रहा है।
राज्य आंदोलनकारियों की परिकल्पना रही गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाए जाने की मांग पिछले 25 वर्षों से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रही है। पर्वतीय भूगोल और क्षेत्रीय संतुलन की दृष्टि से गैरसैंण को राजधानी बनाने की अवधारणा जनता के एक बड़े वर्ग की भावनाओं से जुड़ी रही है। बावजूद इसके, अब तक की सरकारों पर गैरसैंण की उपेक्षा के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में फिर से गैरसैंण में बजट सत्र आयोजित करना एक सशक्त राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है।
प्रदेश के सीमांत और पर्वतीय क्षेत्रों की जनता इस बजट से बड़ी उम्मीदें लगाए बैठी है। सड़क सुविधा से वंचित गांव, स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में जूझती जिंदगी, प्रसव पीड़िताओं को मीलों दूर अस्पताल ले जाने की मजबूरी, युवाओं के लिए रोजगार के सीमित अवसर, ये सभी मुद्दे वर्षों से राजनीतिक भाषणों में तो गूंजते रहे हैं, लेकिन जमीनी बदलाव सीमित ही दिखा है। ऐसे में धामी सरकार के सामने चुनौती है कि वह बजट में पर्वतीय क्षेत्रों के लिए ठोस और लक्षित प्रावधान कर अपनी प्रतिबद्धता साबित करे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री धामी के कार्यकाल के चार वर्ष पूरे होने के साथ सरकार को अपनी उपलब्धियों का ठोस लेखा-जोखा भी प्रस्तुत करना होगा। विपक्ष पहले ही गैरसैंण सत्रों को औपचारिकता करार देता रहा है और इस बार उसने सत्र की अवधि तीन सप्ताह रखने की मांग कर सरकार को घेरने की रणनीति बनाई है। विपक्ष का तर्क है कि यदि सरकार वास्तव में गैरसैंण को महत्व देती है, तो उसे विस्तारित और गंभीर सत्र के माध्यम से ठोस नीति निर्णय लेने चाहिए।
दरअसल, गैरसैंण की उपेक्षा का मुद्दा 2027 के चुनावों में भावनात्मक और क्षेत्रीय असंतुलन के प्रश्न के रूप में उभर सकता है। सरकार भली-भांति जानती है कि यदि गैरसैंण को केवल प्रतीकात्मक रूप में उपयोग किया गया तो इसका राजनीतिक दुष्परिणाम हो सकता है। वहीं, यदि बजट में पर्वतीय विकास, स्वास्थ्य ढांचे के सुदृढ़ीकरण, सीमांत जिलों में आधारभूत संरचना और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार सृजन को प्राथमिकता दी गई, तो यह 2027 की चुनावी जमीन तैयार करने में अहम भूमिका भी निभा सकता है।
कुल मिलाकर गैरसैंण में होने वाला यह बजट सत्र केवल वित्तीय घोषणाओं का मंच नहीं, बल्कि सियासी रणनीति का केंद्र बन चुका है। सरकार के लिए यह अवसर भी है और चुनौती भी या तो गैरसैंण से विकास की नई पटकथा लिखी जाएगी, या फिर यह सत्र भी पूर्व की भांति प्रतीकात्मक बनकर राजनीतिक बहसों तक सीमित रह जाएगा। आने वाला बजट तय करेगा कि गैरसैंण वास्तव में राज्य की दिशा बदलने वाला केंद्र बनता है या फिर चुनावी रणनीति का एक और अध्याय साबित होता है।
