देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून, जिसे कभी शांत, सुरक्षित और सुसंस्कृत शहर के रूप में जाना जाता था, आज अपराध के बढ़ते ग्राफ के कारण भय और असुरक्षा के माहौल में जी रही है। दिनदहाड़े हत्याएं, खुलेआम फायरिंग, भीड़भाड़ वाले इलाकों में वारदातें और अपराधियों का बेखौफ अंदाज़ यह संकेत दे रहा है कि राजधानी की कानून व्यवस्था गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि अपराध अब छिपकर नहीं, बल्कि खुलेआम हो रहे हैं। तिब्बती मार्केट जैसे भीड़भाड़ वाले क्षेत्र में गैस एजेंसी संचालक अर्जुन शर्मा की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या होना केवल एक हत्या नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र पर सवालिया निशान है। जिस समय सचिवालय में कैबिनेट की बैठक चल रही थी, मुख्यमंत्री, मंत्री और शीर्ष अधिकारी राज्य के विकास पर मंथन कर रहे थे, उसी समय कुछ ही दूरी पर एक व्यक्ति को गोलियों से भून दिया जाता है। यह दृश्य बताता है कि अपराधियों के भीतर अब पुलिस या प्रशासन का कोई भय नहीं बचा है।
बीते दो महीनों में हुई घटनाओं पर नजर डालें तो स्थिति और भी भयावह दिखाई देती है। 2 फरवरी को मच्छी बाजार में गुंजन की गला रेतकर हत्या, 31 जनवरी को ऋषिकेश शिवाजी नगर में एम्स की सहायिका प्रीति रावत की गोली मारकर हत्या, 29 जनवरी को ढालीपुर विकासनगर में 18 वर्षीय छात्रा का संदिग्ध परिस्थितियों में शव मिलना, 26 दिसंबर को सेलाकुई में त्रिपुरा के छात्र एंजेल चकमा की चाकू मारकर हत्या—ये सभी घटनाएं किसी एक क्षेत्र की नहीं, बल्कि पूरे राजधानी क्षेत्र और आसपास के इलाकों की बिगड़ती कानून व्यवस्था की तस्वीर पेश करती हैं।
इन मामलों में एक और गंभीर पहलू यह है कि कई मामलों में आरोपी फरार हैं, कुछ मामलों में गिरफ्तारी हुई भी तो वह भी संयोगवश या स्वयं थाने पहुंचने के बाद। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पुलिस की खुफिया व्यवस्था, गश्त प्रणाली और अपराध नियंत्रण तंत्र पूरी तरह सक्रिय है? यदि अपराधी खुलेआम हत्या कर फरार हो जा रहे हैं, तो यह केवल पुलिस की कार्यप्रणाली पर ही नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे पर प्रश्नचिन्ह है।
दून पुलिस का सोशल मीडिया पर ट्रोल होना केवल डिजिटल प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि जनता के आक्रोश और असंतोष की अभिव्यक्ति है। जब आम नागरिक यह महसूस करने लगे कि शिकायत करने के बाद भी कार्रवाई नहीं होती, अपराधियों पर कोई त्वरित दबाव नहीं बनता और अपराध के बाद केवल औपचारिक बयानबाजी होती है, तब विश्वास टूटता है। कानून व्यवस्था केवल सरकारी आंकड़ों से नहीं, बल्कि जनता की अनुभूति से मजबूत या कमजोर मानी जाती है।
राजधानी किसी भी राज्य का चेहरा होती है। अगर राजधानी असुरक्षित है, तो राज्य की छवि अपने आप धूमिल होती है। निवेश, पर्यटन, शिक्षा और सामाजिक वातावरण—all कुछ कानून व्यवस्था से जुड़ा होता है। देहरादून शिक्षा का बड़ा केंद्र है, यहां देशभर से छात्र आते हैं, सेना और प्रशासनिक संस्थान हैं, न्यायालय हैं, सचिवालय है। ऐसे शहर में यदि आम आदमी, महिलाएं, छात्र और व्यापारी खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे, तो यह बेहद गंभीर स्थिति है।
यह भी विचारणीय है कि अपराधों की प्रकृति बदल चुकी है। पहले अपराध छिपकर होते थे, अब प्रदर्शन की तरह हो रहे हैं। भीड़भाड़ वाले इलाकों में हत्या करना अपराधियों के आत्मविश्वास और पुलिस के भय के खत्म होने का संकेत है। यह केवल कानून व्यवस्था का संकट नहीं, बल्कि सामाजिक विघटन का भी संकेत है।
समाधान केवल बयान देने से नहीं होगा। इसके लिए बहुस्तरीय कार्रवाई जरूरी है।
इसके साथ ही प्रशासनिक नेतृत्व को यह समझना होगा कि अपराध केवल पुलिस की समस्या नहीं है, यह शासन व्यवस्था की सामूहिक जिम्मेदारी है। जब तक अपराधियों में कानून का डर नहीं होगा और जनता में कानून पर भरोसा नहीं लौटेगा, तब तक स्थिति नहीं सुधरेगी।
आज देहरादून केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक प्रतीक बन गया है, यह प्रतीक है उस संकट का, जिसमें कानून व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और जनविश्वास तीनों एक साथ कमजोर पड़ते दिख रहे हैं।
यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह स्थिति केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि समाज के मनोविज्ञान में स्थायी भय और असुरक्षा भर देगी। और जब कोई समाज डर के साथ जीने लगे, तो विकास, शांति और समृद्धि केवल शब्द बनकर रह जाते हैं।
अब जरूरत है कि सरकार, प्रशासन और पुलिस केवल प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि रणनीतिक कार्रवाई करें। अपराध पर नियंत्रण केवल अभियान नहीं, बल्कि सतत नीति होनी चाहिए।
क्योंकि राजधानी का सुरक्षित होना केवल व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता का प्रश्न है।
