- 20 किमी पैदल सफर कर रही जिंदगी, अब आर-पार की लड़ाई
- बीमारों को डोली में ढोने की मजबूरी, सड़क न बनने पर आंदोलन तेज
- ग्रामीणों ने दी चुनाव बहिष्कार की चेतावनी
नदीम परवेज@धारचूला,रा. वि.। देश जहां विकास की नई ऊंचाइयों को छू रहा है और आधुनिक सड़कों-हाईवे का जाल बिछाया जा रहा है, वहीं सीमांत क्षेत्रों की सच्चाई आज भी बेहद दर्दनाक है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जनपद के धारचूला ब्लॉक की ग्राम पंचायत कनार इसका जीता-जागता उदाहरण है, जो आजादी के 78 साल बाद भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित है।

(प्राथमिक विद्यालय तो खुला, मगर सड़क नहीं पहुंची)
करीब 250 परिवारों और लगभग 1500 की आबादी वाला यह गांव आज भी विकास से कोसों दूर है। कनार पहुंचने के लिए लोगों को लगभग 20 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। न सड़क, न वाहन, बारिश, बर्फबारी या अंधेरी रात, हर हाल में यह कठिन सफर तय करना यहां के लोगों की मजबूरी है। इसका सबसे ज्यादा असर बुजुर्गों, महिलाओं और स्कूली बच्चों पर पड़ रहा है, जिन्हें रोजाना लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ती है।
सबसे भयावह स्थिति तब होती है जब गांव में कोई बीमार पड़ता है। सड़क न होने के कारण मरीजों को डोली में लिटाकर 20 किलोमीटर तक पैदल सड़क तक लाया जाता है, ताकि आगे अस्पताल पहुंचाया जा सके। हर महीने औसतन 10 मरीज इसी तरह अस्पताल पहुंचाए जाते हैं। कई मामलों में समय पर इलाज न मिलने से लोगों की जान भी जा चुकी है।
वर्षों से बरम से कनार तक सड़क निर्माण की घोषणाएं होती रही हैं, लेकिन आज तक यह योजना कागजों से बाहर नहीं निकल पाई। इससे नाराज ग्रामीणों ने अब आंदोलन का रास्ता अपना लिया है। कनार से लेकर पिथौरागढ़ तक विरोध का बिगुल बज चुका है और लोग धरने पर बैठ गए हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि पक्ष-विपक्ष दोनों ही उनकी अनदेखी कर रहे हैं। क्षेत्रीय विधायक और सांसद पर भी उपेक्षा के आरोप लगाए जा रहे हैं। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द सड़क निर्माण शुरू नहीं हुआ तो वे 2027 के चुनाव का बहिष्कार करेंगे। साथ ही आंदोलन को और तेज करते हुए आमरण अनशन तक जाने की तैयारी भी की जा रही है।
कनार के लोगों का सवाल अब भी वही है, आखिर कब तक उन्हें इस मूलभूत सुविधा के लिए संघर्ष करना पड़ेगा?
