- नीलोंग घाटी में ग्रामीणों की ज़मीन पर सेना का कब्ज़ा? हाईकोर्ट सख्त, सरकारों से जवाब तलब
देहरादून @ रा. वि.।
चीन सीमा से सटे नीलोंग घाटी के ग्रामीणों की जमीन कथित रूप से बिना विधिवत अधिग्रहण प्रक्रिया के सेना द्वारा अपने नियंत्रण में लिए जाने के मामले ने अब न्यायिक मोड़ ले लिया है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गुरुवार को केंद्र के रक्षा और गृह मंत्रालय समेत प्रदेश के गृह विभाग, सचिव वन और जनजातीय कल्याण निदेशालय से जवाब तलब किया है।
यह मामला उत्तरकाशी की जढ़ भोटिया जनकल्याण समिति की ओर से दायर याचिका पर न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ में सुना गया। याचिका में दावा किया गया है कि वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद सेना ने घाटी को अपने नियंत्रण में लेकर आम नागरिकों का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया था। इसके बाद ग्रामीणों की जमीन पर स्थायी ढांचे और हेलीपैड तक बनाए गए, लेकिन विधिसम्मत अधिग्रहण और मुआवजा प्रक्रिया पूरी नहीं की गई।
याचिका के अनुसार, वर्ष 1990 में केंद्र सरकार ने नीलोंग गांव की 278 नाली भूमिधरी और 18 नाली सरकारी भूमि के हस्तांतरण को मंजूरी दी थी, पर अधिग्रहण की औपचारिक प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई। इसके बावजूद सेना द्वारा भूमि का उपयोग जारी रखा गया और ग्रामीणों को किसी प्रकार का मुआवजा नहीं मिला।
ग्रामीणों का कहना है कि वर्ष 2014 से 2019 तक उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार को कई बार प्रत्यावेदन दिए, लेकिन उनकी समस्याओं पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। उपेक्षा से क्षुब्ध होकर वर्ष 2019 में जढ़ भोटिया जनकल्याण समिति का गठन किया गया।
साल 2020 में उत्तरकाशी के जिलाधिकारी ने पुनर्वास के मुद्दे के समाधान के लिए 13 सदस्यीय समिति बनाई, जिसमें सेना और अन्य सशस्त्र बलों को भी शामिल किया गया। संयुक्त सर्वेक्षण रिपोर्ट में यह पुष्टि हुई कि नेलोंग गांव की 6.173 हेक्टेयर भूमिधरी जमीन पर सेना का कब्जा है, जहां भवन और हेलीपैड बने हैं। वहीं जादुंग गांव की 2.807 हेक्टेयर भूमि पर भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी), सेना और वन विभाग काबिज हैं।
इस बीच वर्ष 2024 में सरकार ने जादुंग गांव को ‘वाइब्रेंट विलेज’ के रूप में विकसित करने और 23 होमस्टे चरणबद्ध तरीके से स्थापित करने की घोषणा की। लेकिन ग्रामीणों का सवाल है कि जिनकी जमीन दशकों से कब्जे में है और जिन्हें अब तक मुआवजा नहीं मिला, क्या उन्हें इस विकास योजना में समान भागीदारी और पुनर्वास का अधिकार मिलेगा?
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की है कि उन्हें वाइब्रेंट विलेज योजना का लाभ दिया जाए, विधिसम्मत मुआवजा सुनिश्चित किया जाए और विकास के साथ उनका सम्मानजनक पुनर्वास किया जाए।
सीमा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के बीच फंसे इन सीमांत ग्रामीणों की पीड़ा अब अदालत के दरवाज़े तक पहुंच चुकी है। आने वाली सुनवाई में सरकारों के जवाब पर सबकी निगाहें टिकी हैं।
