Ganga Cleaning Still Incomplete: CAG Report Exposes Failures of Namami Gange Project
- चार दशक बाद भी गंगा मैली, योजनाओं पर हजारों करोड़ खर्च बेअसर
- नमामि गंगे पर उठे सवाल, कैग रिपोर्ट में खुली शुद्धिकरण की हकीकत

-ज्ञानेन्द्र रावत-
गंगा शुद्धि का मामला आज भी अनसुलझा है। देश की धर्मभीरू जनता गंगा शुद्धि के मामले में चालीस साल बाद भी खुद को ठगा सा महसूस कर रही है। इन बीते चार दशकों से वह देश की सत्ता पर काबिज वह चाहे कांग्रेस की राजीव गांधी सरकार हो, जनतादल-भाजपा नीतित.वी पी सिंह सरकार हो, कांग्रेस समर्थित चंद्रशेखर सरकार हो, देवगौड़ा-इंद्र कुमार गुजराल की संयुक्त मोर्चा सरकार हो, अटल बिहारी बाजपेयी सरकार हो,मनमोहन सिंह की संप्रग सरकार हो या फिर नरेन्द्र मोदी नीतित राजग सरकार हो, गंगा शुद्धिकरण के नामपर दावे दर दावे तो करती रही है लेकिन उसे कामयाबी दिलाने में नाकाम रही हैं। राष्ट्रीय नदी गंगा जिसे हम पुण्य सलिला, जीवनदायिनी और मोक्षदायिनी आदि-आदि नामों से जानते हैं और जिसकी देश में मां के समान पूजा की जाती है, वह चार दशक बाद आज भी मैली है और अपने ताड़नहहार की प्रतीक्षा में है कि कोई भगीरथ आये और उसे प्रदूषण रूपी दानव से मुक्ति दिलाये।
विडम्बना यह है कि राजीव गांधी के 1984 में सत्तासीन होने के बाद 1986 में गंगा एक्शन प्लान लागू होने के बाद बीते इन चार दशकों में गंगा शुद्धि के नाम पर हजारों-हजार करोड़ की राशि खर्च करने के बावजूद देश की आस्था की पहचान गंगा देशवासियों के स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित नहीं रह गयी है। वह सेहत के लिए खतरनाक साबित हो रही है। उसका जल आचमन लायक भी नहीं रह गया है। वह पुण्य नहीं मौत का सबब बन गया है।
गौरतलब है कि गंगा के उद्गम गोमुख से लेकर गंगासागर में मिलने तक गंगा की 2525 किलोमीटर की यात्रा में पड़ने वाले राज्यों की पड़ताल से पहले यदि गंगा के मायके उत्तराखंड में ही गंगा की शुद्धि का जायजा लें तो हकीकत खुद-ब-खुद सामने आ जाती है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक ( कैग ) की उत्तराखंड में नमामि गंगे कार्यक्रम पर केंद्रित वर्ष 2018 से 2023 की लेखा परीक्षा रिपोर्ट गंगा की बदहाली की ओर ही इशारा कर रही है। कैग की यह रिपोर्ट जो इस दौरान गंगा में प्रदूषण रोकने, नियंत्रित करने या उसे कम करने की कार्यक्रम की प्रभावशीलता के आंकलन से सम्बंधित थी, पिछले दिनों राज्य विधान सभा के बजट सत्र में सदन के पटल पर रखी गयी थी।
रिपोर्ट के अनुसार गोमुख से लेकर देवप्रयाग तक गंगा का पानी आचमन योग्य यानी ए श्रेणी में है जबकि इससे आगे ऋषिकेश और हरिद्वार तक नहाने योग्य यानी बी श्रेणी का है। कैग ने लेखा परीक्षा के कार्यक्रम में कई खामियों की ओर इशारा किया है। इसमें कहा गया है कि राज्य सरकार ने गंगातट पर बसे शहरों में पूरक सीवेज सुविधाओं में वृध्दि हेतु धन ही आवंटित नहीं किया । रिपोर्ट के मुताबिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के डिज़ाइन में खामियां, इंफ्रास्ट्रक्चर का खराब रखरखाव, गंगा में गिरने वाले नालों को रोकने में नाकामी और नदियों व छोटी धाराओं के पास कचरा फेंके जाने पर अंकुश लगा पाने आदि में नाकामियों शामिल हैं।
सीएजी की रिपोर्ट को देखें तो 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद गंगा शुद्धिकरण के बाबत बनी महत्वाकांक्षी योजना ‘नमामि गंगे’ के लागू होने के बाद के हालात गंगा शुद्धिकरण की दिशा में’ नाकामियों का पिटारा ‘ ही कहे जायेंगे। वह चाहे वानिकी हस्तक्षेप का मामला हो, जिसमें 885.91 करोड़ के बजट में 54,855.43 हैक्टेयर में पेड़ों को लगाने के निर्धारित लक्ष्य के विपरीत आवंटित फण्ड का केवल सीवेज इंफ्रास्ट्रक्चर का लेशमात्र भी इस्तेमाल नहीं हो पाया।
वहां न एसटीपी बने,न घरों को सीवर कनेक्शन ही दिये गए। चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी और उत्तरकाशी में वहां की संस्कृति, रीति-रिवाज और स्थानीय जरूरतों को समझे बिना 11 श्मशान घाटों का निर्माण जो न तो इस्तेमाल हो रहे हैं और न ही उनका रखरखाव हो रहा है। हालात गवाह हैं कि वहां गंगा किनारे ही चिताएं जलती रहती हैं। राज्य के अधिकारी राज्य नदी संरक्षण प्राधिकरण द्वारा 2020 तक बिना ट्रीट किया शहरी गंदा पानी और औद्योगिक कचरा गंगा में गिरने से रोकने हेतु 13 साल बाद भी कोई योजना बनाने में नाकाम रहे हैं।
गंगा किनारे बसे सात शहर नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कीर्तिनगर, चमोली, श्रीनगर, श्रीकोट और जोशीमठ में बने 21 एसटीपी में से एक भी घर का किसी एसटीपी से न जुड़ना, सीवर लाइन की कमी और ट्रीटमेंट की अपर्याप्त क्षमता के कारण घरों में सीवेज कनेक्टिविटी का कुछ ही घरों तक ही सीमित रहना जबकि हरिद्वार और ऋषिकेश में क्षमता से ज्यादा सीवेज मिलने से एसटीपी का ओवरलोडिंग की समस्या से जूझना और जोशीमठ और देवप्रयाग में सीवेज का बहाव कम होना साबित करता है कि एसटीपी अपने मकसद में नाकाम रहे हैं।
यह भी कि जर्मन डेवलपमेंट बैंक जैसी संस्थाओं द्वारा दिया फंड केवल हरिद्वार और ऋषिकेश तक ही सीमित रहा। हालत यह है कि ढालवाला ( ऋषिकेश ), कीर्तिनगर, रुद्रप्रयाग, श्रीकोट, गोपेश्वर, कर्णप्रयाग में बने 12 एसटीपी बिना ट्रीट किए सीवेज सीधे गंगा में बहा रहे हैं। 44 में से 8 एसटीपी चार साल से ज्यादा समय से बिना पीसीबी की मंजूरी के चालू हैं। यह जहां नियम-कानूनों का खुला उल्लंघन है, वहीं पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। 18 एसटीपी निर्माण के बाद से आजतक उत्तराखंड पेयजल निगम द्वारा उत्तराखंड जल संस्थान को सौंपे ही नहीं गये हैं। उपरोक्त उदाहरण गंगा शुद्धिकरण की दिशा में राज्य सरकार के अधिकारियों, प्रशासन और नमामि गंगे योजना की नाकामी को ही दर्शाता है जिसके कारण एसटीपी अपने मकसद में नाकाम रहे या यूं कहें कि सीवेज से जुड़ी समस्याओं के निस्तारण का प्रबंधन ठीक से न हो सका।
गंगा की यह हालत गंगा के मायके उत्तराखंड में है जहां गंगा का उदगम स्थल है। इससे यह साबित होता है कि गंगा की यह बदहाली जब उसके मायके उत्तराखंड में है तो उसके बहाव क्षेत्र उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में तो क्या होगी,उसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। वह बात दीगर है कि गंगा शुद्धिकरण के और नमामि गंगे योजना की कामयाबी के दावे कितने भी किये जायें। जबकि गंगा आज भी मैली है। इसका अहम कारण गंगा के बहाव क्षेत्र के अधिकांश जगहों पर कोलिफार्म बैक्टीरिया की मात्रा मानक से 45 गुणा से भी ज्यादा पायी गयी है। बहाव क्षेत्र के 71 फीसदी इलाके में कोलिफार्म की मात्रा खतरनाक स्तर पर पायी गई है।
सीपीसीबी इसकी पुष्टि कर चुका है। एनजीटी ने भी माना है कि गंगा के 60 फीसदी हिस्से में बिना ट्रीटमेंट के सीधे गंदगी बहायी जा रही है। सालिड और लिक्विड वेस्ट सीधे गंगा में गिराये जाने और टोटल कोलिफार्म और फीकल कोलिफार्म का स्तर औसत से कई गुणा ज्यादा होने से हानिकारक कीटाणुओं की तादाद इतनी ज्यादा पायी गयी है जिससे चर्म रोग के मामले बढ़ रहे हैं।गंगाजल में जानलेवा बीमारियां पैदा करने वाले ऐसे जीवाणु मिले हैं जिनपर अब एंटीबायोटिक दवाओं का भी असर नहीं होता।
यह भयावह संकेत है। हालिया अध्ययन इसके जीते जागते सबूत हैं। शोध- अध्ययनों में खुलासा हुआ है कि गंगा बेसिन में माइक्रोप्लास्टिक के उच्च प्रसार के चलते न केवल पारिस्थितिकीय तंत्र बल्कि पानी के स्रोत भी इसकी चपेट में हैं। दरअसल माइक्रोप्लास्टिक बायोडिग्रेबल नहीं होता। वह पर्यावरण में जमा होता रहता है। इससे समुद्री तंत्र, जीव-जंतु, कई सरी सृप, मीन और पक्षी प्रजातियों के लिए भीषण खतरा है। इनकी गंगा में मौजूदगी मानव स्वास्थ्य ही नहीं, प्राणी मात्र के लिए भी भीषण खतरा है। इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। यह कम चिंतनीय नहीं है और देश की करोडो़ं-करोड़ धर्मभीरू जनता के लिए खतरे की घंटी भी है।
यूनीवर्सिटी आफ शिकागो के एनर्जी पालिसी इंस्टीट्यूट के शोध में खुलासा हुआ है कि गंगा किनारे के मैदानी इलाकों में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ते जाने से लोगों की उम्र सात साल कम हो गयी है। और गंगा के पानी में घुले एंटीबायोटिक जानलेवा साबित हो रहे हैं। यूनीवर्सिटी आफ यार्क के वैज्ञानिकों के शोध के निष्कर्षों के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र ने एंटीबायोटिक की प्रतिरोधक क्षमता समाप्त होने को वर्तमान में स्वास्थ्य सम्बंधी समस्याओं में सबसे बडी़ समस्या माना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वैक्टीरिया या वायरस पर एंटीबायोटिक्स के बेअसर होने के कारण दुनिया में हर साल सात लाख मौतें होती हैं।
वर्ष 2030 तक यह आंकडा़ बढ़कर 10 लाख को पार कर जायेगा।असलियत में गंगा के पानी के साथ सबसे बडी़ समस्या यह है कि धार्मिक भावना के वशीभूत होकर इसमें बहुत बडी़ तादाद में लोग नहाते हैं। यही नहीं उसके जल का आचमन भी करते हैं। इससे गंगाजल के सीधे मुंह में जाने से एंटीबायोटिक प्रतिरोधी वैक्टीरिया सीधे शरीर में प्रवेश कर जाता है और शरीर पर अपना असर दिखाने लगता है।
गंगा शुद्धि के अभियान में केन्द्र सरकार के सात मंत्रालयों की साख दांव पर है। इसके बावजूद गंगा मैली क्यों है? यह समझ से परे है।हकीकत में गंगा तब तक साफ नहीं होगी जब तक स्थानीय निकाय ईमानदारी से अपनी भूमिका का निर्वहन न करने लग जायें और इस अभियान में जन भागीदारी की अहमियत समझते हुए उनका सहयोग लिया जाये। फिर सबसे अहम योगदान देश की धर्म प्राण जनता की जागरूकता का है। जब तक वह अपनी मां का महत्व नहीं समझेगी और गंगा को खुद ब खुद साफ रखने का संकल्प नहीं लेगी, तब तक गंगा की सफाई की ये सारी कबायदें बेमानी रहेंगी और गंगा साफ हो पायेगी, यह सपना सपना ही बना रहेगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।)
