
लेखक: प्रो० डॉ० राकेश रयाल (मनरागी)
कभी गांव की चौपाल केवल बैठकों का स्थान नहीं होती थी, बल्कि वह रिश्तों की धड़कन थी। वहां जब सरपंच या प्रधान की अगुवाई में पंचायत बैठती, तो वह केवल समस्याओं के समाधान का मंच नहीं होती थी, वह सामाजिक एकता, आपसी विश्वास और सामूहिक चेतना का जीवंत उदाहरण होती थी।
लोग अपनी बात रखते थे, लेकिन शब्दों के साथ उनके भाव, आवाज़ की मर्यादा और बड़ों के प्रति आदर भी उतना ही महत्वपूर्ण होता था। उस समय संवाद केवल बोलने का माध्यम नहीं, बल्कि समझने और जोड़ने की प्रक्रिया था। किसी बुजुर्ग की एक गहरी नजर ही काफी होती थी यह बताने के लिए कि बात कहां तक उचित है और कहां मर्यादा की सीमा पार हो रही है।
असहमति भी होती थी, पर उसमें कटुता नहीं होती थी। विचार अलग हो सकते थे, लेकिन दिल जुड़े रहते थे। अपनापन इतना गहरा था कि पंचायत का हर निर्णय केवल निर्णय नहीं, पूरे समाज की सहमति का प्रतीक बन जाता था।
लेकिन आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। चौपाल की वह सजीव संस्कृति अब व्हाट्सएप समूहों में सिमट गई है। संवाद आज भी होता है, बल्कि पहले से कहीं अधिक तेज़ी से होता है, लेकिन उसमें आत्मीयता का अभाव साफ दिखाई देता है। शब्द तो हैं, पर उनमें संवेदना की गर्माहट कम होती जा रही है।
आज लोग खुलकर बोलते हैं, लेकिन इस खुलापन में कई बार मर्यादाएं पीछे छूट जाती हैं। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अपनापन और बड़ों के प्रति सम्मान का भाव धीरे-धीरे धूमिल पड़ता जा रहा है। जब इस विषय पर बात होती है, तो अक्सर एक तर्क सामने आता है, अब सब जागरूक हैं, हर कोई आत्मनिर्भर है, किसी से डरने की क्या जरूरत?
यह तर्क सतही तौर पर आत्मनिर्भरता और जागरूकता का प्रतीक लगता है, लेकिन इसके भीतर एक सूक्ष्म अहंकार भी छिपा होता है। सच यह है कि जागरूकता का अर्थ यह नहीं कि हम सम्मान करना भूल जाएं। आत्मनिर्भर होना सराहनीय है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम रिश्तों की गरिमा को नजरअंदाज कर दें।
पहले बड़ों का सम्मान डर की वजह से नहीं, बल्कि उनके अनुभव, ज्ञान और संस्कारों के प्रति आदर के कारण होता था। आज “डरना क्यों” की सोच ने उस सम्मान की नींव को ही कमजोर करना शुरू कर दिया है।
व्हाट्सएप की इस नई पंचायत में न कोई बड़ा दिखता है, न छोटा। जो सबसे ज्यादा बोलता है या अपनी बात को सबसे आक्रामक ढंग से रखता है, वही खुद को सही साबित करने में लगा रहता है। यहां संवाद कम और स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की होड़ ज्यादा नजर आती है।
यह बदलाव केवल तकनीक का नहीं, बल्कि हमारी सोच का है। हमने सुविधाओं को तो तेजी से अपनाया, लेकिन उनके साथ आने वाली जिम्मेदारियों को नजरअंदाज कर दिया। तकनीक ने भौतिक दूरी जरूर कम की है, लेकिन दिलों के बीच की दूरी कहीं अधिक बढ़ा दी है।
अब जरूरत इस बात की है कि हम आधुनिकता को अपनाते हुए अपनी जड़ों को न भूलें। व्हाट्सएप समूह भी वही भूमिका निभा सकते हैं, जो कभी चौपाल निभाती थी, यदि हम उसमें संयम, सम्मान और अपनापन फिर से जीवित करें।
क्योंकि असली प्रगति केवल कमाने या बोलने की स्वतंत्रता में नहीं, बल्कि इस समझ में है कि कब, कैसे और किसके सामने क्या कहना है। यही समझ समाज को मजबूत बनाती है, न कि केवल शब्दों की तीव्रता या तर्कों की चमक।
(लेखक उत्तराखंड शासन में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी हैं)
