- जनप्रतिनिधियों की मर्यादा पर सवाल, कानून का राज या राजनीतिक दबाव?
देहरादून@रा. वि.।
प्रदेश में बोर्ड परीक्षाओं की शुरुआत के दिन शिक्षा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी पर कथित हमले की घटना ने शासन-प्रशासन और राजनीति, दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। उमेश शर्मा काऊ और उनके समर्थकों पर प्रारंभिक शिक्षा निदेशक के साथ अभद्रता व मारपीट के आरोपों ने न केवल शिक्षा महकमे को झकझोर दिया, बल्कि जनप्रतिनिधियों की मर्यादा और कानून व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह घटना ऐसे समय सामने आई जब पूरे प्रदेश में बोर्ड परीक्षाएं प्रारंभ हुई हैं। शिक्षक संगठनों और कर्मचारियों ने हमलावरों पर सख्त कार्रवाई न होने की स्थिति में परीक्षाओं के बहिष्कार की चेतावनी दी है। यदि ऐसा होता है तो इसका सीधा नुकसान लाखों विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ेगा। सरकार के लिए यह स्थिति दोहरी चुनौती बन चुकी है—एक ओर कानून व्यवस्था की साख, दूसरी ओर परीक्षा व्यवस्था की निरंतरता।
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और विपक्ष की तीखी प्रतिक्रियाओं ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है। महेंद्र भट्ट द्वारा संबंधित विधायक से जवाब-तलब की बात कही गई है, लेकिन जनमानस की अपेक्षा इससे आगे बढ़कर निष्पक्ष और त्वरित कार्रवाई की है।
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को विशेष अधिकार जरूर प्राप्त हैं, परंतु उससे अधिक उनकी जिम्मेदारी भी है। यदि सत्ता से जुड़े लोग ही कानून हाथ में लेते दिखाई दें, तो यह व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है। शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी प्रकार की दबंगई या राजनीतिक हस्तक्षेप न केवल प्रशासनिक मनोबल तोड़ता है, बल्कि समाज में गलत संदेश भी देता है।
यह समय राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर संस्थागत गरिमा और कानून के राज को स्थापित करने का है। सरकार को स्पष्ट करना होगा कि कानून सबके लिए समान है, चाहे वह आम नागरिक हो या जनप्रतिनिधि। तभी शिक्षा व्यवस्था, प्रशासन और लोकतंत्र, तीनों की विश्वसनीयता बनी रह सकेगी।
